ए1 व ए2 दूध की कहानी

गौ की महिमा’ पुस्तिका से साभार उधृत

मूल गाय के दूध में प्रोलीन अपने स्थान 67 पर बहुत दृढ़ता से अपने पड़ोसी स्थान 66 पर स्थित अमीनोएसिड आइसोल्युसीन से जुड़ा रहता है। परन्तु जब (ए1 दूध में) प्रोलीन के स्थान पर हिस्टिडीन आ जाता है, तब इस हिस्तिडीन में अपने पड़ोसी स्थान 66 पर स्थित आइसोल्युसीन से जुड़े रहने की प्रबलता नहीं पाई जाती है।

Hestidine, मानव शरीर की पाचन क्रिया में आसानी से टूटकर बिखर जाता है और बीसीएम 7 नामक प्रोटीन बनता है। यह बीटा कैसो मार्फिन 7 अफीम परिवार का मादक पदार्थ (Narcotic) है जो बहुत प्रभावशाली आक्सीडेण्ट एजेंट के रूप में मनुष्य के स्वास्थ्य पर मादक तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव छोड़ता है। ऐसे दूध को वैज्ञानिकों ने ए1 दूध का नाम दिया है। यह दूध उन विदेशी गायों में पाया जाता जिनके डी. एन. ए. में 67वें स्थान पर प्रोलीन न होकर हिस्टिडीन होता है (दूध की एमीनो ऐसीड चेन में)।

न्युजीलैंड में जब दूध को बीसीएम 7 के कारण बड़े स्तर पर जानलेवा रोगों का कारण पाया गया तब न्यूजीलैंड के सारे डेयरी उद्योग के दूध का परीक्षण हुआ। डेयरी दूध पर किये जाने वाले प्रथम अनुसंधान में जो दूध मिला वह बीसीएम 7 से दूषित पाया गया, और वह सारा दूध ए1 कहलाया। तदुपरान्त विष रहित दूध की खोज आरम्भ हुई। बीसीएम 7 रहित दूध को ए2 नाम दिया गया। सुखद बात यह है कि देशी गाय का दूध ए2 प्रकार का पाया जाता है। देशी गाय के दूध से यह स्वास्थ्य नाशक मादक विषतत्व बीसीएम 7 नहीं बनता। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से अमेरिका में यह भी पाया गया कि ठीक से पोषित देशी गाय के दूध और दूध से बने पदार्थ मानव शरीर में कोई भी रोग उत्पन्न नहीं होने देते।

यदि भारतवर्ष का डेयरी उद्योग हमारी देशी गाय के ए2 दूध की उत्पादकता का महत्व समझ लें तो भारत तो भारत सारे विश्व डेयरी दूध व्यापार में विश्व का सबसे बड़ा पंचगव्य उत्पाद निर्यातक देश बन सकता है। यदि हमारी देशी गोपालन की नीतियों को समाज और शासन को प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित पोषाहार का निर्यात भारतवर्ष से किया जा सकता है।

आज सम्पूर्ण विश्व में यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्था में बच्चो को केवक ए2 दूध ही देना चाहिए। विश्व बाजार में न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, कोरिया, जापान और अब अमेरिका में प्रमाणित ए2 दूध के दाम साधारण ए1 डेयरी दूध के दाम से कहीं अधिक हैं। ए2 दूध देने वाली गाय विश्व में सबसे अधिक भारतवर्ष में पाई जाती है।

होल्सटीन, फ्रीजियन प्रजाति की गाय, अधिक दूध देने के कारण सारे डेयरी दूध उद्योग की पसन्दीदा है। इन्हीं के दूध के कारण लगभग सारे विश्व में डेयरी का दूध ए1 पाया गया। विश्व के सारे डेयरी उद्योग और राजनेताओं की यही समस्या है कि अपने सारे ए1 दूध को एकदम कैसे अच्छे ए2 दूध में परिवर्तित करें। अतः आज विश्व का सारा डेयरी उद्योग भविष्य में केवल ए2 दूध के उत्पादन के लिए अपनी गायों की प्रजाति में नस्ल सुधार के लिए नये कार्यक्रम चला रहा है। विश्व बाजार में भारतीय नस्ल के गीर वृषभों की इसीलिए बहुत मां ग हो गई हो। साहीवाल नस्ल के अच्छे वृषभों की भी बहुत मांग बढ़ी है।

सबसे पहले यह अनुसंधान न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने किया था। परन्तु वहां के डेयरी उद्योग और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से यह वैज्ञानिक अनुसंधान छुपाने के प्रयत्नों से उद्विग्र होने पर, 2007 में Devil in the milk illness, health and politics A1 and A2, नाम की पुस्तक कीथ वुड्फोर्ड (Keith Woodford) द्वारा न्यूजीलैंड में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में 30 वर्षों के अध्ययन के परिणाम दिए गए हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और रोगों के अनुसंधान के आंकड़ो से यह सिद्ध किया गया है कि बीसीएम 7 युक्त ए1 दूध मानव समाज के लिए विषतुल्य है, अनेक असाध्य रोगों का कारण है।

ए1 दूध का मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव

जन्म के समय बालक के शरीर में बीबीबी (ब्लड़ ब्रेन बैरियर) नहीं होता। स्तन पान कराने के बाद 3-4 वर्ष की आयु तक शरीर में यह ब्लड़ब्रेन बैरियर स्थापित हो जाता है। इसीलिए जन्मोपरान्त स्तन पान द्वारा शिशु को मिले पोषण का, बचपन में ही नहीं, बड़े हो जाने पर भी मस्तिष्क व शरीर की रोग निरोधक क्षमता, स्वास्थ्य और व्यक्तित्व के निर्माण पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

बाल्य काल के रोग

भारतवर्ष ही नहीं सारे विश्व में, जन्मोपरान्त बच्चों में जो औटिज्म़ (बोध अक्षमता) और मधमेह (Diabetes Type 1) जैसे रोग बढ़ रहे हैं, उनका स्पष्ट कारण बीसीएम 7 वाला ए1 दूध है।

व्यस्क समाज के रोग

मानव शरीर के सभी सुरक्षा तंत्र विघटन से उत्पन्न (Metabolic Degenerative) रोग जैसे उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा मधुमेह का प्रत्यक्ष सम्बन्ध बीसीएम 7 वाले ए1 दूध से स्थापित हो चुका है। यही नहीं बुढ़ापे के मानसिक रोग भी बचपन में ग्रहण ए1 दूध के प्रभाव के रूप में भी देखे जा रहे हैं। दुनिया भर में डेयरी उद्योग आज चुपचाप अपने पशुओं की प्रजनन नीतियों में अच्छा दूध अर्थात् बीसीएम 7 मुक्त ए2 दूध के उत्पादन के आधार पर बदलाव ला रहा है।

अमेरिकी कुनिति, हमारी भूल

अमेरीकी तथा यूरोपीय देश अपने विषाक्त गौवंश से छुटकारा पाने के लिए उन्हें मंहगे मूल्यों पर भारत में भेज रहे हैं। ये हाल्स्टीन, जर्सी, एच एफ उन्हीं की देन है।

देश में दूध की जरूरत पूरी करने के नाम पर, दूध बढ़ाने के लिए अपनी सन्तानों और देशवासियों को विषैला, रोगकारक दूध पिलाना उचित कैसे हो सकता है? आखिरकार इन नीति निर्धारक नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के परिवार, बच्चे और वे स्वयं भी तो इन रोगों का शिकार बन रहे होंगे। सच तो यह है कि वे सब इन खतरों से अनजान है। जो चन्द वैज्ञानिक व नागरिक इसके बारे में जानते हैं, उनकी आवाज़ इतनी ऊँची नहीं कि सच सब तक पहुंचे। विदेशी व्यापारी ताकतें और बिका मीडिया इन तथ्यों को दबाने, छुपाने के सब सम्भव व उपाय व्यापारी ताकतों के हित में करता रहता है।

हमारा कर्तव्य, एक आह्वान

ज़रा विहंगम दृष्टि से देश व विश्व के परिदृश्य को निहारें। तेजी से सब कुछ बदल रहा है, सात्विक  शक्तियां बलवान होती जा रही हैं। हम सब भी सामथ्यानुसार, सम्भव सहयोग करना शुरू करें, सफलता मिलती नजर आएगी। कम से कम अपने आसपास के लोगों को उपरोक्त तथ्यों की जानकारी देना शुरू करें, या इससे अधिक जो भी उचित लगे करें। सकारात्मक सोच, साधना, उत्साह बना रहे, देखें फिर क्या नहीं होता।

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विदेशी गौवंश से जैविक खेती असंभव

विदेशी गोवंश अथार्थ वह गाय की प्रजाति जो भारत से बाहर की हो उस गोवंश का दूध-घी अनेक असाध्य रोग पैदा करता हैं, उसका गोबर व गौमूत्र विषमुक्त कैसे हो सकता हैं? हमारी जानकारी के अनुसार जिन खेतों में इनकी गोबर खाद डलेगी, उनमे खेती होने के उपरांत उपज बहुत घट जायेगी, उन खेतों में उपज उससे अधिक होगी जिनमे इनके गोबर की खाद नहीं पड़ी। इस प्रकार की जैविक खेती का वर्णन अधोलिखित है |

कुछ अनुभव, कुछ सरल प्रयोग

  • गाय का गोबर हाथों पर साबुन की तरह लगाकर हाथ धोंये। यदि हाथ चिकने, मुलायम हो जाए तो उस गाय-बैल में ‘ए१’ विष नहीं हैं या कम हैं। पर यदि हाथ खुश्क हो जाए (चिकने न हो) तो वह पूरी तरह विषाक्त हैं। गजरौला के निकट एक गाँव के किसानो ने इस गाय को ‘पूतना’ नाम दिया हैं। वहीं जो श्री कृष्ण को जहरीला स्तनपान करवाने गई थी।
  • जिस खेत में विदेशी गोवंश को घुमा देंगे उसकी फसल मर जायेगी या बहुत ही कम होगी। ‘एचऍफ़’ और ‘होलिस्टिन’ में यह विष अधिक हैं। बुवाई से पहले घुमाने पर भी यही दुष्प्रभाव होगा। जिस खेत में स्वदेशी गाय-बैल को घुमा देंगे, उसकी फसल १०-२० प्रतिशत बढ़ जाएगी।
  • अनेक किसानों का अनुभव हैं कि हमारा स्वदेशी केंचुआ विदेशी गायों के गोबर में नहीं टिकता, भाग जाता हैं। वह स्वदेशी गायों के गोबर में बड़े आराम से पलता, बढ़ता रहता हैं। यानी केंचुआ भी विदेशी गोवंश के गोबर की विषाक्तता को पहचानता हैं। पर हमारे वैज्ञानिक?

कुलपति पर प्रभाव

‘गवाक्ष भारती’ में एक लेख इसी विषय पर छपा था जिसका शीर्षक था ‘समझदार केंचुए – न समझे वैज्ञानिक’। औद्यानिकी विश्विद्यालय – नौणी (सोलन) के कुलपति उस लेख को पढ़कर बड़े प्रसन्न व प्रभावित हुए कि उन्होंने गवाक्ष भारती का सदस्य बनाने की इच्छा प्रकट की। तभी से वे इस पत्रिका के संरक्षक हैं।

विदेशी केंचुआ विषाक्त?

स्मरणीय हैं कि विदेशी केंचुआ ‘एसीना फोएटीडा’ विदेशी गोवंश के विषैले गोबर में बड़े आराम से रहता हैं। इससे संदेह होता हैं कि उस केंचुए द्वारा बनी गोबर खाद और भी हानिकारक हो सकती हैं। विदेशी केचुए और उससे बनी खाद को सरकार व विदेशी एजेंसियों द्वारा बढ़ावा देने से संदेह को और अधिक बल मिलता हैं।

अपनी खाद, अपना केंचुआ

अतः सुझाव हैं कि खाद के लिए स्वदेशी गोवंश के गोबर पर थोडा गौमूत्र व देसी गुड़ घोलकर छिड़काव करें, भरपूर स्वदेशी केंचुए पैदा होंगे। खाद बनने पर इसे छानना जरुरी नहीं हैं। इसी गोबर खाद की एक दो टोकरी नई खाद बनाते समय डालें, गुड़ का घोल अल्प मात्रा में डालें, केंचुए पैदा हो जाते हैं। इस प्रकार की जैविक खेती ही सर्वश्रेष्ठ उपज प्रदान करती है | इसीलिए कहा जाता है अपनी खाद, अपना केंचुआ |

अनुपम हैं अपने गौ पंचगव्य उत्पाद

इसके अलावा गोवंश के घी, दूध, गोबर, गौमूत्र से अधरंग, उच्च रक्तचाप, माईग्रेन, स्त्रियों का प्रदर रोग, लीवर व किडनी फेलियर, हृदय रोग सरलता से ठीक होते हैं। इन पर विवरण अगले अंकों में देने का प्रयास रहेगा। पर इतना सुनिश्चित हैं कि विदेशी गोवंश और हाईब्रिड व जी.एम. बीजों के रहते जैविक खेती असंभव हैं। इतना ही नहीं, किसान की समृद्धी व सुख भी स्थाई नहीं हो सकते।

विदेशी गोवंश का समाधान

समाधान सरल हैं। जिस प्रकार विदेशी सांडों के वीर्य से कृत्रिम गर्भधारण करके हमने अपने गोवंश को बिगाड़ा हैं। उसी प्रकार अब अपनी इन गऊओं को स्वदेशी नस्ल से गर्भाधान करवाएं। यदि स्वदेशी बैल न मिलें तो पाशुपालन विभाग के सहयोग से साहिवाल, रेड सिन्धी के वीर्य का टिका लगवाए।

इस प्रक्रिया से केवल एक पीढ़ी में काफी हद तक वंश सुधार हो जायेगा। तीसरी पीढ़ी में तो लगभग पूरी तरह गोवंश स्वदेशी बनाना संभव हैं। अतः समस्या बड़ी तो हैं पर समाधान भी सरल हैं।

पंचायत प्रधान व प्रभावी लोगों के सहयोग से सरकार को प्रेरित किया जा सकता हैं कि वह स्वदेशी साड़ों या उनके वीर्य की (या दोनों की) व्यवस्था करें। कठिनाई होने पर गवाक्ष भारती कार्यालय से संपर्क करे, आशा हैं समाधान मिलेगा।

सोने से भरपूर पंचगव्य

अनेक मूल्य तत्वों के आलावा गाय के दूध, घी व मूत्र में स्वर्ण अंश भी पाए जाते हैं। आयुर्वेद के इलावा अब तो आधुनिक विज्ञान भी मनाता है कि स्वर्ण से हमारी जीवनी शक्ति, बल ओज बहुत बढ़ जाते हैं।

विदेशी/ स्वदेशीनैनो गोल्ड एच डी एल

‘जनरल ऑफ़ अमेरिकन क्रैमिकल्ज’ में छपी एक खर के अनुसार उन्होंने स्वर्ण के नैनो कणों से ‘एच. डी. एल.’ बनाया है। नार्थ वैस्ट विश्वविद्यालय द्वारा बनाये इस ‘एच. डी. एल.’ के बारे मे दावा किया गया हैं कि इसके प्रयोग से हानिकारक ‘एल. डी. एल.’ का स्तर कम होगा और तले, भुने पदार्थ रोगी खूब खा सकेंगे।

पर हम भारतीयों को अमेरिकियों के बनाये ‘एच. डी. एल.’ की क्या जरूरत हैं, हमारे पास स्वर्ण युक्त पंचगव्य वाली स्वदेशी गाय जो है। है न? नहीं है तो व्यवस्था करनी होगी, अपने घर पर संभव नहीं तो किसी किसान के पास, ताकि उसके उत्पाद हमें मिल सके। याद रहे के इसके घी से कभी कोलेस्ट्रोल नहीं बढ़ता अर्थात यह हृदय के लिए लाभदायक है। जितना हो सके लोगो को स्वदेशी गाय के गोभर, गोमूत्र से ही जैविक खेती करने को प्रेरित करे |

हमारे शास्त्रों के अनुसार हमारी गाय की पीठ में ‘सूर्य केतु’ नाम की नाडी है जो सूर्य के प्रकाश में स्वर्ण का निर्माण करती है, जिससे इसका दूध, घी अमूल्य गुणों से भरपूर हो जाता हैं।

स्वदेशीविदेशी गोवंश की पहचान

न्यूज़ीलैंड में विषयुक्त और विषरहित (ए१ और ए२) गाय की पहचान उसकी पूंछ के बाल की डी.न.ए. जाँच से हो जाती है। इसके लिए एक २२ डॉलर की किट बनाई गई थी। भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हैं। केंद्र सरकार के शोध संस्थानों में यह जांच होती हैं पर किसानो को तो यह सेवा उपलब्द ही नहीं है। वास्तव में हमें इस जांच की जरुरत भी नहीं है। हम अपने देसी तरीकों से यह जांच सरलता से कर सकते हैं।

ऐसी हैं अपनी गौ

हमारी गाय की,

  • पीठ गोलाकार-ढलानदार (पूँछ की और)
  • झालरदार गलकंबल
  • थूथ
  • बड़े कान
  • सुन्दर आँखे
  • बाल छोटे-मोटे
  • खाल चमकीली
  • मख्खी-मच्छर उड़ने के लिए वह अपनी खाल को सरलता से प्रकम्पित कर लेती हैं
  • गोबर बन्धा
  • धारीदार
  • उसके आसपास दुर्गन्ध नहीं होती
  • मख्खियां अपेक्षाकृत काफी कम होती है।

सुक्ष्म दर्शी से देखने पर प्रति वर्ग से.मी. १५०० से १६०० छिद्र पाए जाते हैं जिससे शारीर में वाष्पिकरण सहज होता है। यह काफी अधिक गर्मी-सर्दी सह सकती है। रोग निरोधक शक्ति प्रबल है। अतः रोग तथा मृत्युदर कम है।

विदेशी गोवंश ऐसा हैं

इसके विपरीत विदेशी गोवंश के,

  • गलकंबल व थूथ (चुहड़) नहीं होती। (कुछ स्वदेशी गोवंश भी बिना थूथ या बहुत छोटी थूथ वाला है।)
  • बाल लम्बे व बारीक
  • खल चमक रहित व दुर्गान्धित
  • खाल प्रकम्पन नहीं कर सकती
  • गोबर भैंस जैसा ढीला व रेखा रहित
  • आसपास दुर्गन्ध व बहुत मख्खियां होती हैं
  • आंखें भी सुन्दर नहीं
  • अधिकांश के माथे के मध्य में सींग जैसी हड्डी भी उभरी रहती है, मानो राक्षस हो। कथा-कहानियों में राक्षसों के माथे पर सींग दिखाया जाता है।
  • पीठ सीधी व पूंछ की तरफ नोकदार हड्डियां पीछे की और निकली रहती हैं। पीठ जीतनी सीधी और पूंछ की ओर नोकदार भाग जितना अधिक उभरा हो, वह गौ उतनी विषाक्त होगी। अधिक विषयुक्त गाय की आंखें भी बहार को उभरी व डरावनी होंगी।

भारत में मिलीजुली नस्ले बढ़ती जा रही हैं। अतः कई गऊए मिलेजुले लक्षणों की होंगी। जिसमें जैसे लक्षण जितने अधिक होंगे, वह इतनी लाभदायक या हानिकारक होंगी।

डरावनी आंखें, माथे पर उभरी हुई हड्डी, बाल लम्बे पीठ सीधी नोकीले पिछाडे़ वाले लक्षणों की गाय बहुत हानिकारण मानी जानी चाहिए। इनके संपर्क, इसकी आवाज (रम्भा ने) मात्र से अनेक शारीरिक मानसिक रोग संभव हैं।

इस प्रकार हम सरलता से देशी-विदेशी, अच्छी-बुरी गोवंश की पहचान कर सकते हैं और उनके वंश सुधर के प्रयास कर सकते हैं। विशेष ध्यान रहे कि अपनी गऊओं के सिंग कभी काटने की भूल न करें। ये एक एण्टीना की तरह काम करते हैं और चन्द्रमा तथा दिव्य अन्तरिक्षीय उर्जा को ग्रहण करने में सहायता करते हैं।

-राज विशारद

 

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विषाक्त है विदेशी गऊओं का दूध

मथुरा के ‘पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय एवं गौ अनुसंधन संस्थान’ में नेशनल ब्यूरो आफ जैनेटिक रिसोर्सिज़, करनाल (नेशनल क्रांऊसिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च-भारत सरकार) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. देवेन्द्र सदाना द्वारा एक प्रस्तुति 4 सितम्बर को दी गई।

मथुरा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सामने दी गई प्रस्तुति में डा. सदाना ने जानकारी दी किः

अधिकांश विदेशी गोवंश (हॅालस्टीन, जर्सी, एच एफ आदि) के दूध में ‘बीटा कैसीन ए1’ नामक प्रोटीन पाया जाता है जिससे अनेक असाध्य रोग पैदा होते हैं। पांच रोग होने के स्पष्ट प्रमाण वैज्ञानिकों को मिल चुके हैं –

  1. इस्चीमिया हार्ट ड़िजीज (रक्तवाहिका नाड़ियों का अवरुद्ध होना)।
  2. मधुमेह-मिलाईटिस या डायबिट़िज टाईप-1 (पैंक्रिया का खराब होना जिसमें इन्सूलीन बनना बन्द हो जाता है।)
  3. आटिज़्म (मानसिक रूप से विकलांग बच्चों का जन्म होना)।
  4. शिजोफ्रेनिया (स्नायु कोषों का नष्ट होना तथा अन्य मानसिक रोग)।
  5. सडन इनफैण्ट डैथ सिंड्रोम (बच्चे किसी ज्ञात कारण के बिना अचानक मरने लगते हैं)।

टिप्पणीः विचारणीय यह है कि हानिकारक ए1 प्रोटीन के कारण यदि उपरोक्त पांच असाध्य रोग होते हैं तो और उनेक रोग भी तो होते होंगे। यदि इस दूध के कारण मनुष्य का सुरक्षा तंत्र नष्ट हो जाता है तो फिर न जाने कितने ही और रोग भी हो रहे होंगे, जिन पर अभी खोज नहीं हुई।

दूध की संरचना

आमतौर पर दूघ में,
83 से 87 प्रतिशत तक पानी
3.5 से 6 प्रतिशत तक वसा (फैट)
4.8 से 5.2 प्रतिशत तक कार्बोहाइड्रेड

3.1 से 3.9 प्रतिशत तक प्रोटीन होती है। इस प्रकार कुल ठोस पदार्थ 12 से 15 प्रतिशत तक होता है। लैक्टोज़ 4.7 से 5.1 प्रतिशत तक है। शेष तत्व अम्ल, एन्जाईम विटामिन आदि 0.6 से 0.7 प्रतिशत तक होते है।

गाय के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन 2 प्रकार के हैं। एक ‘केसीन’ और दूसरा है ‘व्हे’ प्रोटीन। दूध में केसीन प्रोटीन 4 प्रकार का मिला हैः

अल्फा एस1 (39 से 46 प्रतिशत)
एल्फा एस2 (8 से 11 प्रतिशत)
बीटा कैसीन (25 से 35 प्रतिशत)
कापा केसीन (8 से 15 प्रतिशत)

गाय के दूध में पाए गए प्रोटीन में लगभग एक तिहाई ‘बीटा कैसीन’ नामक प्रोटीन है। अलग-अलग प्रकार की गऊओं में अनुवांशिकता (जैनेटिक कोड) के आधार पर ‘केसीन प्रोटीन’ अलग-अलग प्रकार का होता है जो दूध की संरचना को प्रभावित करता है, या यूं कहे कि उसमें गुणात्मक परिवर्तन करता है। उपभोक्ता पर उसके अलग-अलग प्रभाव हो सकते हैं।

बीटा कैसीन ए1, ए2 में अन्तर क्या है?

बीटा कैसीन के 12 प्रकार ज्ञात हैं जिनमें ए1 और ए2 प्रमुख हैं। ए2 की एमिनो एसिड़ श्रृंखला (कड़ी) में 67 वें स्थान पर ‘प्रोलीन’ होता है। जबकि ए1 प्रकार में यह ‘प्रोलीन’ के स्थान पर विषाक्त ‘हिस्टिडीन’ है। ए1 में यह कड़ी कमजोर होती है तथा पाचन के समय टूट जाती है और विषाक्त प्रोटीन ‘बीटा कैसोमार्फीन 7’ बनाती है।

विदेशी गोवंस विषाक्त क्यों है?

जैसा कि शुरू में बतलाया गया है कि विदेशी गोवंश में अधिकांश गऊओं के दूध में ‘बीटा कैसीन ए1’ नामक प्रोटीन पाया गया है। हम जब इस दूध को पीते हैं और इसमें शरीर के पाचक रस मिलते हैं व इसका पाचन शुरू होता है, तब इस दूध के ए1 नामक प्रोटीन की 67वीं कमजोर कड़ी टूटकर अलग हो जाती है और इसके ‘हिस्टिाडीन’ से ‘बी.सी.एम. 7’ (बीटा कैसो माफिन 7) का निर्माण होता है। सात सड़ियों वाला यह विषाक्त प्रोटीन ‘बी.सी.एम 7’ पूर्वोक्त सारे रोगों को पैदा करता है। शरीर के सुरक्षा तंत्र को नष्ट करके अनेक असाध्य रोगों का कारण बनता है।

भारतीय गोवंस विशेष क्यों

करनाल स्थित भारत सरकार के करनाल स्थित ब्यूरो के द्वारा किए गए शोध के अनुसार भारत की 98 प्रतिशत नस्लें ए2 प्रकार के प्रोटीन वाली अर्थात् विष रहित हैं। इसके दूध की प्रोटीन की एमीनो एसिड़ चेन (बीटा कैसीन ए2) में 67वें स्थान पर ‘प्रोलीन’ है और यह अपने साथ की 66वीं कड़ी के साथ मजबूती के साथ जुड़ी रहती है तथा पाचन के समय टूटती नहीं। 66वीं कड़ी में ऐमीनो ऐसिड ‘आइसोल्यूसीन’ होता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भारत की 2 प्रतिशत नस्लों में ए1 नामक एलिल (विषैला प्रोटीन) विदेशी गोवंश के साथ हुए ‘म्यूटेशन के कारण’ आया हो सकता है।

एन.बी.ए.जी.आर. – करनाल द्वारा भारत की 25 नस्लों की गऊओं के 900 सैंम्पल लिए गए थे। उनमें से 97-98 प्रतिशत ए2ए2 पाए गए गथा एक भी ए1ए1 नहीं निकला। कुछ सैंम्पल ए1ए2 थे जिसका कारण विदेशी गोवंस का सम्पर्क होने की सम्भावना प्रकट की जा रही है।

गुण सूत्र

गुण सूत्र जोड़ों में होते हैं, अतः स्वदेशी-विदेशी गोवंश की डी.एन.ए. जांच करने पर

‘ए1, ए2’

‘ए1, ए2’

‘ए2, ए2’

के रूप में गुण सूत्रों की पहचान होती है। स्पष्ट है कि विदेशी गोवंश ‘ए1ए1’ गुणसूत्र वाला तथा भारतीय ‘ए2, ए2’ है।

केवल दूध के प्रोटीन के आधार पर ही भारतीय गोवंश की श्रेष्ठता बतलाना अपर्याप्त होगा। क्योंकि बकरी, भैंस, ऊँटनी आदि सभी प्राणियों का दूध विष रहित ए2 प्रकार का है। भारतीय गोवंश में इसके अतिरिक्त भी अनेक गुण पाए गए हैं। भैंस के दूध के ग्लोब्यूल अपेक्षाकृत अधिक बड़े होते हैं तथा मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव करने वाले हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों के अनुसार भी भैंस का दूध मस्तिष्क के लिए अच्छा नहीं, वातकारक (गठिाया जैसे रोग पैदा करने वाला), गरिष्ठ व कब्जकारक है। जबकि गो दूग्ध बुद्धि, आयु व स्वास्थ्य, सौंदर्य वर्धक बतलाया गया है।

भारतीय गोवंस अनेक गुणों वाला है

1. बुद्धिवर्धकः खोजों के अनुसार भारतीय गऊओं के दूध में ‘सैरिब्रोसाईट’ नामक तत्व पाया गया है जो मस्तिष्क के ‘सैरिब्रम को स्वस्थ-सबल बनाता है। यह स्नायु कोषों को बल देने वाला, बुद्धि वर्धक है।

2. गाय के दूध से फुर्तीः जन्म लेने पर गाय का पछड़ा जल्दी ही चलने लगता है जबकि भैंस का पाडा रेंगता है। स्पष्ट है कि गाय एवं उसके दूध में भैंस की अपेक्षा अधिक फुर्ती होती है।

3. आँखों की ज्योति, कद और बल को बढ़ाने वालाः भारतीय गौ की आँत 180 फुट लम्बी होती है। गाय के दूध में केरोटीन नामक एक ऐसा उपयोगी एवं बलशाली पदार्थ मिलता है जो भैंस के दूस से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। बच्चों की लम्बाई और सभी के बल को बढ़ाने के लिए यह अत्यन्त उपयोगी होता है। आँखों की ज्योति को बढ़ाने के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। यह कैंसर रोधक भी है।

4. असाध्य बिमारीयों की समाप्तिः गाय के दूध में स्टोनटियन नामक ऐसा पदार्थ भी होता है जो विकिर्ण (रेडियेशन) प्रतिरोधक होता है। यह असाध्य बिमारियों को शरीर पर आक्रमण करने से रोकने का कार्य भी करता है। रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है जिससे रोग का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

5. रामबाण है गाय का दूध – ओमेगा 3 से भरपूरः वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद यह सिद्ध हो चुका है कि फैटी एसिड ओमेगा 3 (यह एक ऐसा पौष्टिकतावर्धक तत्व है, जो सभी रोगों की समाप्ति के लिए रामबाण है) केवल गो माता के दूध में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है। आहार में ओमेगा 3 से डी. एच. तत्व बढ़ता है। इसी तत्व से मानव-मस्तिष्क और आँखों की ज्योति बढ़ती है। डी. एच. में दो तत्व ओमेगा 3 और ओमेगा 6 बताये जाते हैं। मस्तिष्क का संतुलन इसी तत्व से बनता है। आज विदेशी वैज्ञानिक इसके कैप्सूल बनाकर दवा के रूप में इसे बेचकर अरबो-खरबो रुपये का व्यापार कर रहे हैं।

6. विटामिन से भरपूर-माँ के दूध के समकक्षः प्रो. एन. एन. गोडकेले के अनुसार गाय के दूध में अल्बुमिनाइड, वसा, क्षार, लवण तथा कार्बोहाइड्रेड तो हैं ही साथ ही समस्त विटामिन भी उपलब्ध हैं। यह भी पाया गया कि देशी गाय के दूध में 8 प्रतिशत प्रोटीन, 0.7 प्रतिशत खनिज व विटामिन ए, बी, सी, डी व ई प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं, जो गर्भवती महिलाओं व बच्चों के लिए अत्यन्त उपयोगी होते हैं।

7. कॅालेस्ट्राल से मुक्तिः वैज्ञानिकों के अनुसार कि गाय के दूध से कोलेस्ट्रोल नहीं बढ़ता। हृदय रोगियों के लिए यह बहुत उपयोगी माना गया है। फलस्वरूप मोटापा भी नहीं बढ़ता है। गाय का दूध व्यक्ति को छरहरा (स्लिम) एवं चुस्त भी रखता है।

8. टी.बी. और कैंसर की समाप्तिः क्षय (टी.बी) रोगी को यदि गाय के दूध में शतावरी मिलाकर दी जाये तो टी.बी. रोग समाप्त हो जाता है। एसमें एच.डी.जी.आई. प्रोटीन होने से रक्त की शिराओं में कैंसर प्रवेश नहीं कर सकता। पंचगव्य आधारित 80 बिस्तर वाला कैंसर हॅास्पिटल गिरी विहार, संकुल नेशनल हाईवे नं. 8, नवसारी रोड़, वागलधारा, जि. बलसाड़, गुजरात में है। यहा तीसरी स्टेज के कैंसर के रोगियों का इलाज हो ता पर अब उनकी सफलता किन्ही कारणों से पहले जैसी नहीं रही है।

9. इन्टरनेशनल कार्डियोलॅाजी के अध्यक्ष डा. शान्तिलाल शाह ने कहा है कि भैंस के दूध में लाँगचेन फेट होता है जो नसों में जम जाता है। फलस्वरूप हार्टअटैक की सम्भावना अधिक हो जाती ही। इसलिए हृदय रोगियों के लिए गाय का दूध ही सर्वोत्तम है। भैंस के दूध के ग्लोब्यूल्ज़ भी आकार में अधिक बड़े होते हैं तथा स्नायु कोषों के लिए हानिकारक हैं।

10. बी-12 विटामिनः बी-12 भारतीय गाय की बड़ी आंतों में अत्यधिक पाया जाता है, जो व्यक्ति को निरोगी एवं दीर्घायु बनाता है। इससे बच्चों एवं बड़ों को शारीरिक विकास में बढ़ोतरी तो होती ही है साथ ही खून की कमी जैसी बिमारियां (एनीमिया) भी ठीक हो जाती है।

11. गाय के दूध में दस गुणः
चरक संहिता (सूत्र 27/217) में गाय के दूध में दस गुणों का वर्णन है-

स्वादु, शीत, मृदु, स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्।
गुरु मंदं प्रसन्नं च गल्यं दशगुणं पय॥

अर्थात्- गाय का दूध स्वादिष्ट, शीतल, कोमल, चिकना, गाढ़ा, श्लक्ष्ण, लसदार, भारी और बाहरी प्रभाव को विलम्ब से ग्रहरण करने वाला तथा मन को प्रसन्न करने वाला होता है।

12. केवल भारतीय देसी नस्ल की गाय का दूध ही पौष्टिकः करनाल के नेशनल ब्यूरो आफ एनिमल जैनिटिक रिसोर्सेज (एन.बी.ए.जी.आर.) संस्था ने अध्ययन कर पाया कि भारतीय गायों में प्रचुर मात्रा में ए2 एलील जीन पाया जाता हैं, जो उन्हें स्वास्थ्यवर्धक दूध उप्तन्न करने में मदद करता है। भारतीय नस्लों में इस जीन की फ्रिक्वेंसी 100 प्रतिशत तक पाई जाती है।

13. कोलेस्ट्रम (खीस) में है जीवनी शक्तिः प्रसव के बाद गाय के दूध में ऐसे तत्व होते हैं जो अत्यन्त मूल्यवान, स्वास्थ्यवर्धक हैं। इसलिए इसे सूखाकर व इसके कैप्सूल बनाकर, असाध्य रोगों की चिकित्सा के लिए इसे बेचा जा रहा है। यही कारण है कि जन्म के बाद बछड़े, बछिया को यह दूध अवश्य पिलाना चाहिए। इससे उसकी जीवनी शक्ति आजीवन बनी रहती है। इसके अलावा गौ उत्पादों में कैंसर रोधी तत्व एनडीजीआई भी पाया गया है जिस पर यूएस पेटेन्ट प्राप्त है।

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विषैले दूध की कहानी से पर्दा हटा

अनेक लोगों के समान हम लोग भ स्वदेशी गोवंश को उपयोगी समझकर उसके पक्ष में प्रचार, प्रयास कर ह रहे थे। लगभग 5 वर्ष पूर्व ‘नैट’ से वास्ता पड़ा। संयोग की बात कहें या उस परम सत्ता का खेल, एक ऐसी साईट मिली जिससे पता चला कि अधिकांश विदेशी गऊएं ‘ए1’ नामक बीटाकैसीन प्रोटीन वाली है जो विषाक्त प्रभाव वाला और अनेक असाध्य रोग पैदा करता है। यूरोप की कुछ गऊएं ‘ए2’ नामक हानि रहित बीटा कैसीन प्रोटीन वाली बतलाई जाती हैं।

किन्तु किसी भी ‘सर्च इंजन’ ने यह नहीं बतलाया कि भारतीय गैवंश सर्वोत्तम है तथा ‘ए2’ प्रोटीन वाला है। जब हमें पता चला कि ब्राजील ने 40 लाख से अधिक भारतीय गैवंश (गीर, सहिवाल, रैड सिंधी) तैयार किया है तो विश्वास हो गया कि भारतीय गैवंश ‘ए2’ है। बाद में ‘यूट्यूब‘ में देखा कि अमेरीका व अनेक यूरोपीय देश ‘ब्रह्मामिन काऊ‘ के नाम पर शुद्ध भारतीय गोवंश (एच एफ, हॅाल्स्टीन, जर्सी आदि) हमें मंहगे दामों पर दे रहे है।

तभी से विषाक्त ‘ए1‘ के बारे में प्रदेशभर की गौशालाओ व वैज्ञानिको को बतलाने लगे। सरकार पर हमारे प्रयासों का कोई प्रभाव न पड़ना था, न पड़ा।

पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में गौ विज्ञान पर संगोष्ठी

अन्त में प्रभु प्रेरणा से सूझा कि शोध पत्र पठन और सेमिनार इसका समाधान हो सकता है। एक साथी बलदेव राज सूद के प्रयासों से सरकार से 2 लाख रुपये सेमिनार हेतु स्वीकृत हुआ। उन्ही के प्रयास से पालमपुर कृषि वि.वि. के कुलपति डॉ. एस के शर्मा का पूर्ण सहयोग मिला। गोरक्षण-संवर्धन परिषद के रामऋषि भारद्वाज व उनके साथी ललित जी ने आयोजन व्यवस्था सम्भाली, नीतिगत निर्णयों व जटिल समस्याओं को सुलझाने में रोहिताश कुठियाला का बड़ा सहयोग मिला। शिमला विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य अरुण दिवाकर नाथ बाजपेई ने खूब उत्साह बढ़ाया व लम्बी यात्रा करके मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। ‘सेमिनार आयोजन समिति‘ मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य के रूप में औद्यानिकी वि.वि. नौणी, सोलन के कुलपति डॉ. के. आर. धीमान का सहयोग मिला। आयोजन समिति के अध्यक्ष बने शूलिनी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पी. के. खोसला। पी. सी. कपूर (तत्कालीन सचिव पशुपालन विभाग) ने स्वीकृत राशि बढ़ाकर एक से दो लाख करना मान लिया।

एन. बी. ए. जी आर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेन्द्र कुमार सदाना ने तकनीकी परामर्श की जिम्मेवारी सम्भाली। स्मारिका प्रकाशन का जटिल-कठिन कार्य उन्होंने कुशलता से निभाया।

पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति व वैटनरी विभाग की पूरी टीम का अनापेक्षित सहयोग मिला। डॉ. ए. सी. वार्षणेय (अब मथुरा के कुलपति) डॉ. सी वार्षणेय (अब डीन है) आदि सबने सहयोग में कसर नहीं रखी। पंजीकरण का कार्य ‘आर्टआफ लीविंग’ के पुनीत कपूर व उनके साथियों ने सम्भाला। एक साथी देवानन्द गौतम अपनी गाड़ी लेकर निरन्तर साथ बने रहे व सम्भव सहयोग करते रहे। पालमपुर प्रैस से शारदान्द गौतम, प्रैस के प्रधान व अन्य सबका खूब सहयोग मिला।

नागपुर के गोविज्ञान केन्द्र-देवला पार के श्री सुनील मानसिंहका अनुभव पूर्ण सहयोग व मार्गदर्शन इस आयोजन की सफलता का एक स्तम्भ रहा।

पशुपालन विभाग के निर्देशक डॉ. डी. पी. मल्होत्रा संयुक्त निर्देशक डॉ. अश्विनी गुप्ता तथा डॉ. अशोक की टीम का भी भरपूर सहयोग मिला।

अन्ततोगत्व 25-26 मई 2012 को दो दिवसीय ‘गोविज्ञान’ पर राष्ट्रीय संगोष्टी सम्पन्न हुई। संगोष्टी में प्रस्तुत शोध पत्रों से स्पष्ट हो गया कि विदेशी गोवंश विषाक्त हे और स्वदेशी विषमुक्त, लाभदायक प्रोटीन वाला है। निर्देशक डॉ. मल्होत्रा मंच से बोले कि हम नीतियां बनाने वाले हैं, लगता है कि हमसे गलती हो गई है।

तब से लेकर आज तक चार निर्देशक सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पर यह सूचना (ए1, ए2) हिमाचल पशुपालन विभाग के निर्देशालय से निकलकर विभाग के शेष चिकित्सकों तक नहीं पहुंची है। सरकारी नीतियाँ भी जैसी की तैसी हैं। सारे देश व पहाड़ की श्रेष्ठ गऊओं को विषाक्त विदेशी सांडों के वीर्य के टीके लगाकर पीढ़ी दर पीढ़ी अधिकाधिक विषाक्त बनाया जाना निरन्तर जारी है।

हम सब साथियों को लगता है कि पशुपालन विभाग के वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, तकनीकी कर्मचारियों के इलावा यह जानकारी (ए1 तथा ए2 प्रोटीन के बारे में) आयुर्वेदिक व एलोपैथिक चिकित्सकों, कृषि व औद्यानिकी वैज्ञानिकों सहित जागरूक नागरिकों, प्रंशासकों, नेताओं समाजसेवियों तक पहुंचनी चाहिए।

हम सबका विश्वास है कि परिवर्तन का समय बहुत पास है। हमारे प्रयास व्यर्थ जाने का कोई कारण नहीं, सफलता सुनिश्चित है। इस अभियान में आप सबका विश्वास, शुभकामनाएं व सहयोग हमारे साथ रहेगा, इसमें हमें सन्देह नहीं।

आपका,
वैद्य राजेश कपूर
Email: [email protected]

Repeat Breeding – Homeopathic Treatment

Homeopathic treatment of repeat breeding in bovines in north Gujarat
S. Chandel, A. I. Dadawala, H. C. Chauhan, Pankajkumar and H. R. Parsani
College of Veterinary Science and Animal Husbandry SDAU
Sardarkrushinagar-385506
Corresponding author email: [email protected]

Introduction

A repeat breeding animal is one which has normal reproductive tract with normal oestrus cycle but which does not settle even to reported services by a fertile bull or inseminate by good quality semen. These can neither be considered as sterile nor can anyone say as to when they will settle to service. The factors responsible for repeat breeding have been reviewed by Roberts (1971) and Pendre (1974). The Fertisule a Homoeopathic complex has been shown to restore normal reproduction rhythm by stimulating Gonadotropin secretions in Fertisule treated animals.

Materials and Methods

A total of 100 cross breed cattle and 85 Mehsani buffaloes were used for the study out of which 10 each (10 cross breed cows and 10 buffaloes) were kept as control without asserting any treatment. In all the treated animals 90 cows and 75 buffaloes were treated with a combination of Homoeopathic medicines and properly monitored for their breeding. The Fertisule tablets were fed continuously for 21 days even if the animal comes in to oestrus in between and bred, Simultaneously the control animals were also monitored as treated animals.

The composition of Fertisule (a combination of Homoeopathic drugs) contains saturated tablets with

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  • Alteris Farinosa 30
  • Aurum Met.30
  • Apis Mel. 30
  • Borex 30
  • Calc. Phos. 30
  • Colocynthis 30
  • Folliculinum 30
  • Iodine 30
  • Murex 30
  • Oophorinum 30
  • Palladium 30
  • Platinum 30
  • Pulsatilla 30
  • Sepia 200

Results and Discussion

Out of 90 cross breed cows, 50 animals came in to oestrus within 16 days and bred and Bred and all were found pregnant when examined per rectally after 2 months of services. Among other 40 animals 30 animals bred within a week after completion of medicine and were found pregnant when examined. Only in 8 animals the same medicine was repeated and they came in to oestrus within 15 days, and bred and settled, among control group to 10 cross bed cows none become pregnant.

Out of 65 buffaloes the Fertisule was introduced in the same schedule as in cattle. All the buffaloes responded and become pregnant in a single treatment schedule but none found pregnant among 10 buffaloes of control group.

Conclusion

Thus it can be concluded that Fertisule ( a combination of homoeopathic drugs) has better response in buffaloes as compared to cattle which might be due to better penetration capacity of this homoeopathic drug in buffaloes. The overall response of fertisule is very good in repeat breeding cattle and buffaloes which have no apparent sign of reproductive abnormalities. The single most important factor satisfactory response is triggering of endocrine secretion which might be responsible for normal reproductive rhythm. Sane et al (1982) also emphasized that optimum balance of various hormones is absolutely necessary for the maintenance of normal pregnancy.

Acknowledgement

The Authors are thankful to Goel Vet Pharma, Chittorgarh, Rajasthan for providing medicines free of cost. Thank are also due to Farmers and field Veterinarians of North Gujarat region for their cooperation in this study, without their support such study would have not been possible.

References

  1. Pandre M D (1994): studies on the aetiology of repeat breeders syndrome in dairy cows Ph D thesis, Budapest.
  2. Roberts S J C (1971): Veterinary Obstetrics and genital disease, CBS publication and Distributors, India.
  3. Sane C R, Luktuke S N, Despande B R I Kakani A S, Vel hanker D P, Hukari V B, and Kodogali S B, (1983):

A Textbook of Reproduction in Farm Animals (Theriogenology) Verghese Publication House, Bombay.

  1. Asso. Professor, Microbiology. 2. SRF in AINP-BT and Ph.D Scholer in Microbiology 3. Asstt. Professor, Microbiology. 4. Asstt. Professor, Microbiology. 5. Asstt. Professor, Parasitology

(Source: Veterinary World Vol.2, No.6, June 2009)

a1 milk vs a2 Milk Benefits & Side Effects

The National Bureau of Animal Genetic Research has recently demonstrated the superior milk quality of Indian Zebu (humped) Cattle breeds specially cow milk. After scanning 22 cattle breeds, scientists concluded that in five types of cow high milk-yielding native breeds – Red Sindhi, Sahiwal, Tharparkar, Rathi and Gir – the status of a2 Beta – Casein gene was 100 percent. In other Indian breeds it was around 94 percent, compared to only 60 percent in exotic breeds like Jersey cattle and HF cow.

What is a2 Milk Benefits?

Many of us not aware about a2 Milk Health Benefits. a2 Milk is 100% natural fresh desi cow’s milk which you may find easier to digest than regular cow milk. Here’s why : Cow milk contains different types of proteins – including the ones called a1 and a2. These two proteins digest quite differently from each other and, for some people, the presence of a1 protein can result in discomfort after drinking milk. It is thanks to Dr. Corran Mclachlan back in 1997, that the impact of this difference in proteins was discovered and the importance of it came into the picture. He  advised to us not to take in use a1 cow milk which provides us Jersey cow and HF cow mostly in india.

a1 Milk Side Effects / Disadvantages

a1 milk side effect

Do you experience digestive issues when drinking milk? You may feel bloated and uncomfortable after breakfast, or get indigestion when you have milk in your tea? Lots of people feel the same and many of them assume that they may be lactose intolerant. For millions of people this may not actually be the case. Instead, they may be reacting to intolerance to the a1 protein – found in most milk sold in India today.

a2 Milk Advantage

The cows make all the difference! Desi cows naturally produce milk containing only the a2 protein and no a1 protein. If you also have experienced digestive issues as a result of a1 protein intolerance, by switching to desi cow’s milk you too can now enjoy the nutritional benefits of a2 Milk.

a1 Milk Vs a2 Milk

[layerslider id=”1″]Here is a fight a1 milk vs a2 milk. A1 milk mostly given by basically two types of cow within india which includes Jersey cow and Holstein Friesian cow (hf cow). During digestion, proteins in jersey cattle milk are broken down into peptides. Most of the peptides are converted into amino acids to be absorbed by the blood stream. But all peptides do not get broken down into amino acids. Some are excreted in our stools and some manage to get through the leaks in the gut wall into the bloodstream while still in peptide form. a1 milk releases a peptide called BCM 7 ( Beta Caso – Morphine 7). This peptide is not broken down into amino acids, making it impossible to digest and has been associated with a very large number of diseases. Thus this BCM 7 is the “Devil in Milk” Which is not present in desi cow’s Milk.

Milk in Detail

  • Milk consists of about 80% of water.
  • The remaining 15% is Fat, Minerals, Proteins and Sugar Lactose.
  • 80 % Protein is Casein and 20 % Whey.
  • Beta Casein is 30% of total Protein content in cow milk.

What is BCM 7?

BCM 7 is a peptide, released in a1 milk.

How did it form?

  • Originally all cows produce a2 Beta-Casein, since they were first domesticated over 10,000 years ago.
  • Some time ago, in the past few thousand years, a natural mutation occurred in some European dairy herds that changed the Beta-Casein they produced.
  • The Gene encoding Beta-Casein such that , the 67th amino acid in the 209 amino acid chain , i.e. the Beta – Casein protein was switched from Proline to Histidine.
  • This new type of Beat – Casein that was created is known as a1 Beta – Casein.
  • The cause of concern with milk containing a1 Beta – Casein is that, 67th amino acid switch from Proline to Histidine readily allows an enzyme to cut out a 7 amino acid segment of the protein immediately adjacent to that histidine. The amino acid that is separated from a1 Beta – Casein is Known as Beta – Casomorphin 7 ( BCM – 7 ).

Risk Factors with BCM 7

  • Type 1 diabetes (DM-1).
  • Coronary heart disease (CHD).
  • Arteriosclerosis.
  • Formation of arterial.
  • Autism in children.
  • sudden infant death syndrome
  • Schizophrenia.
  • Asperger’s syndrome.
  • Endocrine dysfunctions like hormone imbalance, endometritis and related infertility problems in women.
  • Digestive distress and leaky gut syndrome.

BCM 7, is the “Real Devil in the Milk”, It is an Exogenous opioid which does not occur naturally with human body and interacts with human digestive system, internal organs and brain stem.

Milk Nutrition

Milk is one of the richest food sources of calcium, which helps to build strong bones and healthy teeth. According to the Dairy Council, a 200ml glass of cow milk can provide over half (55%) of a child’s daily calcium requirement and over one third (35%) for an adult. As calcium is present only in very small amounts in most common foods, it may be difficult for individuals who are restricted in their intake of milk and milk products to obtain the recommended amount.

Milk is naturally full of other essential vitamins and minerals. A 189 ml serving of milk is a source of B6, Folate, Biotin and Zinc and is packed in protein riboflavin (B2), B12, calcium, potassium, phosphorus and iodine.

Milk proteins

The two main types of milk protein are the casein and the whey proteins. These make up about 80% and 20% of the total protein content of cow’ milk respectively. Beta-casein makes up about one third of the total protein content in milk.

All cows make beta-casein – but it is the type of beta-casein that matters. There are two types of beta-casein: a1 and a2. They differ by only one amino acid. Such a small difference can have a big impact on people who are a1 milk protein intolerant.

Feeling the difference with a2 Milk

Most fresh milk today contains both the a1 and a2 type beta-casein proteins. a2 Milk comes from Desi cows (Gir cow, Sahiwal, Tharparkar) that are specially selected to produce a2 beta-casein protein to the exclusion of a1 beta-casein protein.

These differences in protein composition between a2 Milk and other milk varieties mean that you may feel the difference after drinking a2 Milk and find that your body prefers it.

Common Issues associated with a1 milk

  • Indigestion

    What is indigestion?
    Indigestion is a pain or feeling of discomfort in your chest after eating or drinking.
    What are the symptoms of indigestion?
    The symptoms may vary in individuals but may include one or more of the following;

    • Feeling uncomfortably full or heavy
    • Belching
    • Bringing food back up from your stomach
    • Bloating
    • Feeling sick
    • Vomiting

    What causes indigestion?
    Indigestion is caused by stomach acid coming into contact with the sensitive, protective lining of the digestive system. The stomach acid breaks down the lining, leading to irritation and inflammation.
    How can you treat indigestion?
    Whilst they may work in the short term, taking antacids treat the symptoms rather than the cause of indigestion. Factors such as smoking, drinking alcohol, pregnancy or taking certain medications can cause indigestion although very often it can be caused by what you eat.

  • Constipation

    What is constipation?
    Constipation occurs when a person does not have regular bowel movements.
    What are the symptoms of constipation?
    The symptoms may vary in individuals but may include one or more of the following;

    • • Stomach aches and cramps
    • • Feeling bloated
    • • Feeling sick
    • • Loss of appetite

    Who is affected by constipation?
    Constipation can affect between 4% and 20% of the Indian population and is often associated with conditions such as irritable bowel syndrome.
    Is Cows’ milk linked with indigestion?
    Yes, absolutely A1 protein in Jersey cattle cows’ milk or Hf cow milk may cause inflammation and this could potentially lead to indigestion. If you suspect that cows’ milk is causing indigestion, then you may wish to consider a2 Desi Milk, before eliminating cows’ milk entirely. a2 Milk does not contain A1 protein therefore many people find it easier to digest.

  • Irritable bowel Syndrome

    What is IBS?
    IBS describes a condition where there are disturbances in the bowel and digestion.
    What are the symptoms of IBS?
    The symptoms may vary in individuals but may include one or more of the following;

    • Bloating
    • Constipation
    • Wind
    • Stomach aches/cramps
    • Diarrhoea

    Who is affected by IBS?
    Between 9% and 25% of people (mainly women) suffer from IBS and symptoms include diarrhoea, constipation (or both) and stomach pain.
    What causes IBS?
    There are different causes of IBS and there is no test for it. Diet and lifestyle can often be contributory factors for IBS.
    How can you treat IBS?
    Often a good starting point is to look at lifestyle factors including diet, exercise and stress.
    Is cow’s milk linked with IBS?
    Medical reviews have shown that the symptoms of many patients with IBS are improved once regular cows’ milk is removed from their diet. Regular cow milk means Jersey cattle cows’ milk or Hf cow milk  which can be a reason for IBS in our daily diet. A1 protein, present in regular cows’ milk may cause inflammation in some people. Many people find a2 Desi Milk easier to digest. A2 Milk is a cows’ milk (Gir cow, sahiwal, tharparkar cow etc.) which naturally doesn’t contain A1 protein. The inflammation associated with IBS often interferes with the ability to absorb nutrients such as calcium. As a naturally rich source of calcium a2 Desi Milk may be suitable for people suffering from IBS. Cows’ milk is the main dietary source of calcium and iodine and forms part of a balanced diet.

    (source with editions: svsfarms.com)

Exotic Breeds – Non-indigenous Breeds

HF Cow & Jersey Cow Price

Daily Milk Production

Dairy Farming In India

 

Holstein Friesian Cow (HF Cow)
holstein friesian

Origin: This breed is originated from dutch in North Holland.

Holland is a region and former province on the western coast of the Netherlands in europe where holstein cows found.

Difference between Hf cow and others :

• Holsteins are large, stylish animals with color patterns of black and white or red and white.

• Some time colour pattern of cow can be very light like light red and white.

• Horns are there but sometimes not visible.

• Muggles are broad, nostrils broadly opened and strong jaw.

• HF cows looks very attractive, their body is shiny, eyes naughty and ears medium size.

• HF cow’s head position is straight and their tail colour is white.

• Holstein cows can be breed at 15 months of age, when they weigh about 800 pounds. It is desirable to have Holstein females calve for the first time between 24 and 27 months of age.

HF Cow Milk Per Day

• Hf cow milk per day 40-45 litre/day.

• Milk yield – 7200-9000 kg/per year approximately.
• This is by far the best dairy breed among exotic cattle regarding milk yield. On an average it gives 40 litre of milk per day, whereas a cross breed HF cow gives 10 – 15 litre milk per day.

Holstein Friesian (HF) Cow Price

• Price for Holstein Friesian (HF) Cow differs according to their lactation and milk yield capacity.

• Approximately price of HF cow can be Rs 40000 – 75000.

HF Cow for sale

If you are interested in purchasing or buying HF cow then you can contact to  Tamilnadu, Kerala specially as they are the hub for their selling.

How to maintain HF Cow dairy farming?

HF cows are highly famous for their milk and it’s demand is also very high. Now the question is about their rearing. To know more see video.

♥ Disadvantages of Hf cow dairy farming in india

The above video describes that how much difficult hf cattle farming to us. It needs proper care, medical treatment at regular interval, vaccination every year, specific technical and mechanical cowshed for their comfort. So it will be very costly and agitated for it’s maintenance.

Jersey Cowjersey

Origin: This breed was developed from the island of jersey in the English channel off the coast of France.

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Difference between Jersey Cow and others :

• The Jersey cow is one of the oldest dairy breeds, having been reported by authorities as being pure breed for nearly six centuries
• The color in Jersey cow may vary from a very light gray or mouse color to a very dark fawn or a shade that is almost black.

• Both the bulls and females horns are very small and some time inner folded but nostrils are big.
• Commonly darker about the hips and about the head and shoulders than on the body.
• Age at first calving : 26-30 months
• Intercalving – 13-14 months

Jersey Cow Milk Per Day

• Jersey cow milk per day 30-35 litre/day.

• Milk yield – 5000-8000 kg/per year approximately.
• We can get 2.5 times more milk by breeding between Jersey bull and Indigenous cow

Jersey Cow Price

• Price for Jersey Cow differs according to their lactation and milk yield capacity.

• Approximately price of Jersey cow can be Rs 35000 – 65000.

Jersey Cow for sale

If you are interested in purchasing or buying Jersey cow then you can contact to  Tamilnadu, Kerala specially as they are the hub for their selling.

Draught Breeds – Indigenous Breeds

Draught Breeds

The male animals are good for work and Cows are poor milk yielder are their milk yield as an average is less than 500 kg per lactation. They are usually white in color. A pair of bullocks can haul 1000 kg. Net with an iron typed cart on a good road at walking speed of 5 to 7 km per hour and cover a distance of 30 – 40 km per day. Twice as much weight can be pulled on pneumatic rubber tube carts. The example of this group Kangayam, Umblacherry, Amritmahal, Hallikar.

Cart Pulling Bull & Ploughing Bull

Kangayam Cow BreedKankeyam Bull

Kangayam is a draught breed of cattle and distributed in Kangayam, Dharapuram, Perundurai, Erode, Bhavani and part of Gobichettipalayam talukas of Erode district, Dindigul, Karur and Coimbatore district.

On the other hand, replacement of Kangayam cattle by exotic crosses is high in Udumalpet, Pollachi, Palladam and Tirupur talukas of Coimbatore, and Erode district.

This breed is most closely related to the Umblachery breed of cattle. Kangayam animals are well built and heavier than Umblachery cattle and are found in drier climate, whereas Umblachery are found in the hot humid tract.

Kangayam Cattle – Physical Characteristics

• At the time of birth its skin color is red and after 6 months it turns Grey
• Cows are grey or white and grey. However, animals with red, black, fawn and broken color are also observed. Such animals comprise approximately 1 to 2 % of the total population.
• Horns, muzzle, eyelids, tail switch and hooves are black. Skin is also black.
• Animals are active with compact body and strong physique.
• Legs are short and stout with strong hooves.
• Hump and at the leg joint, the color is grey whereas the rest of the body of bulls is red /black and that of an ox is grey
• Milk yield ranges from 600 to 800 Kg with an average of about 540 Kg in a lactation of about 270 days. Average fat and SNF is 3.88 + 0.07 and 6.96 + 0.05 % respectively.
• Ox have the capacity to work in very hot days too.
• Best suited for ploughing and transport. Withstands hardy conditions.

Amritmahal Cow breedAmrith Mahal Cow

The Amritmahal cattle breed is found in Hassan, Chikmagalur and Chitradurga districts of Karnataka state in southern India. It is a famous draught breed known for its energy, power and endurance. Bullocks are especially-suited for quick transportation. These cattle consisted of three distinct strains: Hallikar, Hagalvadi and Chitaldoorg.

Amritmahal Cow Breed- Physical characteristics

• Color ranges from white to black
• Face, nose and tail are evenly black, in older breed, these parts are lighter
• Color of this breed is white, male is off white and color of bulls ranges from deep to light brown.
• Head is long and tapering towards muzzle. Forehead is narrow, bulging out with a furrow in the middle. Horns are long and emerge from the top of the poll fairly close together in backward and upward direction, turn in and end in sharp black points. Sometimes the long, sharp points touch each other and appear like torch light.
• Eyes are shiny, ears small and placed parallel to the earth
• Hump is fully developed and slightly bent forward, legs are medium in length and in proportion to the rest of the body
• Skin is thin, oily deep black in color and furry
• Udder / Milk glands are small, compact & hard
• Dewlap/ neck wrinkles are small and not too long
• Hoofs/heels are small and hard
• An adult male weighs around 500 kg and female around 318 kg.
• Age at first calving is 1, 337.6±115.52 days and milk yield is 572±24 kg. Calving interval is 577.6±24.32 days and lactation length 299± 10
• Best suitable for ploughing and transport.

Hallikar Cow BreedHalliker Cow

Hallikar cattle is typical Mysore type of cattle found mainly in Mysore, Mandya, Bangalore, Kolar, Tumkur, Hassan and Chitradurga district of Karnataka. It is one of the best draught breed of southern India. In the entire tract bullocks are given special attention. Price of each bullock ranges from Rs. 5, 500 to Rs 10, 000. Females are being used for all kinds of farm operations. They can also work in waterlogged fields and contribute to the farming system.

Hallikar Cow breed – Physical Characteristics

• Color is grey to dark grey with deep shading on the fore and hind quarters. Frequently, there are light grey marking on the face, dewlap and under the body.
• Hallikar cattle are medium sized, compact and muscular in appearance.
• The forehead is prominent giving a slight bulgy appearance and is furrowed in the middle.
• The face is long and tapers towards the muzzle, which is usually grey to black.
• Horns emerge near each other from the top of poll and are carried backward for nearly half their length and slightly inward toward the tips which are black and sharp. Horns almost touch the neck in front of hump when the animal is feeding with its head downward.
• Eyes are small and clear.
• Ears are small tapering to a point.
• Dewlap is thin and moderately developed.
• Tail is fine with a black switch which reaches little below hocks.
• Age at first calving ranges from 915 to 1, 800 days with an average of about 1, 370 days.
• Lactation milk yield is around 540 kg ranging from 227 to 1, 134 kg. Lactation length ranges from 210 to 310 days averaging of about 285 days.
• Fat is about 5.7%.
• Bullocks are strong, well spirited, quick and steady in the field as well as on road.

Umblacherry Cow Breed

Origin: Tanjore district in Tamilnadu.

Distinguishing characters of umblacharry cow breed:Umblacheri Bull

  • This breed has similar characters as kangayam.
  • Bulls are fearly temperament. They are used for ploughing in Thanjore delta area.
  • Calves are red in colour when born and become grey in colour after 6 months of age.
  • Cows are poor milker with average milk yield of 300 kg/lactation.
  • Male animals are good for hard work.

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Upgrading Indigenous cattle of India

Breed Habitat/Main State Breeding Tract Districts Assembling Center Areas of demand Remarks
Hallikar Karnataka Tumkur, Hassan & Mysore Dodbalapur, Chickballapur, Harikar, Devargudda, Chikkuvalli, Karuvalli, Chittavadgi (T.N.) North Arcot (T.N.) Hindupur, Somaghatta, Anantpur (A.P.) Dharwar, North Kanara, Bellary (KT) Anantur & Chittur (A.P.), Coimbatore North Arcot, Salem (T.N.) Draught breed
Kangayam Tamil Nadu Erode Avanashi, Tirppur, Kannauram, Madurai Athicombu Southern Districts of Tamil Nadu Draught breed
Red Sindhi Pakistan All parts of India Dairy breed
Tharparkar Pakistan(sind) Umarkot, Naukot, Dhoro Naro Chor Balotra (Jodhpur), Puskar (Ajmer), Gujarat State Dairy breed
Vechur Kerala Vaikom, Mannuthy (Kerala State)

(Source: National Dairy Development Board)

Milk and Draught breeds – Indigenous Breeds

Dual Purpose Breeds

Indian Cow Breed

Draught Plus Milk Breed

The cows in these breeds are average milk yield and male are very useful for work. Their milk production per lactation is 500 kg to 150 kg. The example of this group is Ongole, Hariana, Kankrej, Tharparkar, Krishna valley, Rathi and Goalo Mewathi.

Hariana Cow BreedHaryana Bull

As the name suggests, Hariana cows are found in Haryana/UP areas.

This breed is one of the most distinguished and dual purpose breed of North India and one of its main uses is in the production of high quality Bull.

Mainly found in Karnal, Hisar and Gurgaon district of Haryana, Delhi and Western M.P. The breed is also reared in the states of Rohtak, Haryana, Hissar, Jeend and Gurgaon.

Apart from the above places, Hariana is found abundantly in Alwar, Jodhpur, Loharu & Bharatpur states of Rajasthan India. In UP it is found near and around states of Meerut, Muzaffarnagar, Bulland Shahar, Aligarh and Bijnaur. Pure and Ascendant form of this breed is prominently seen in certain areas of Rajasthan like Jhajjar, Beri & Jahajgarh.

It is a famous & well known breed in Ganga’s Doab. ( The Doab, unqualified by the names of any rivers, designates the flat alluvial tract between the Ganges and Yamuna rivers in western and southwestern Uttar Pradesh and Uttarakhand state in India, extending from the Sivalik Hills to the two rivers’ confluence at Allahabad. The region has an area of about 23, 360 square miles (60, 500 square km); it is approximately 500 miles (805 km) in length and 60 miles (97 km) in width.

Doab figures prominently in history and myths of Vedic period; the epic Mahabharata, for example, is set in the Doab, around the city of Hastinapur”

Hariana Cow Breed – Physical Characteristics :

• White or light Grey Skin Color.
• In Bulls, Front and posterior part is Dark.
• Long and thin face.
• Muzzle / Nose is always Black .
• Forehead is flat, Horns are small, sharp and rounded towards the inside, eyes are black and attractive.
• In certain breeds, eye’s iris is black too.
• Head is erect and high which gives them an extinguished personality.
• Hump is seen in both male and female breeds and is more prominent in male breed as compared to Females w.r.t to the rest of the body.
• Hoof is black, legs are shapely, attractive and long
• Udder is capacious and extends well forward with a well-developed milk-vein. Milk glands are medium sized and well developed
• Tail is rather short, thin and bent
• Adult body weight is around 499 and 325 kg in males and females respectively.
• Lactation length is about 272 days ranging from 238 to 330 days. Average service period is 232 days (range 126 to 305 days), dry period 255 days (range 133 to 571 days) and calving interval 483 days (range 415 to 561 days).

Tharparkar Cow BreedTharparker Bull

Dakshini Sindh (Pakistan’s) Tharparkar sector is the producer of this cow. This breed is visible from the west region of Rajasthan at Indo Pak Border to Kuchh of Gujarat. The development of this breed of cow is the result of atmospheric conditions of Rajasthan’s Thar Desert and similar areas. Mainly found in Jodhpur, Kutch and Jaisalmer

Tharparkar Cow – Physical Characteristics

• Skin Color – White / light Grey.
• Face & Rest of the body parts are dark.
• Bulls / male cows have curly hair above the forehead.
• Flat forehead, Broad and Elevated over the eyes .
• Horns and face are at the same level.
• In Bulls, the higher part of forehead is more protruded.
• Face is bent, clear and little rounded
• Jaw is very strong and eyes are serene, calm and serious.
• Ears are long, broad and little bent.
• Tharparkar cows breed calve for the first time at an average age of about 1, 247 days (range 1, 116 to 1, 596 days), milk yield is 1, 749 kg (range 913 to 2, 14.7 kg) and calving interval 431 days (range 408 to 572 days)
• Fat content in its milk is 4.9%.
• Milk yield   – Under village condition :1660 kg
• Milk yield   – Under commercial farms: 2500 kg

Kankrej Cow BreedKankrej Bull

Kankrej cattle are one of the most well-known & amongst the largest cattle of India and are prized as powerful draft animals.

It has played an important role in preserving the cow race in USA thus heavily impacting U.S. cattle breeding. They are moderate milk producers. This is a very simple race of cows which adjusts itself to the worst of condition; these cows are very peaceful in nature and in their movement and manner of living.

Kankrej cattle are maintained as a pure breed in India and Brazil in large numbers, with a few in the U. S. They are fertile under adverse conditions.

Kankrej Cow Breed – Physical Characteristics:

• Kankrej cattle are gray cattle of northern India with big, long and round horns.
• Bulls are comparatively darker in color then the rest of the breed.
• Having small but broad faces with long ears drooping and open to the front.
• Color varies from light gray to black at maturity.
• Age at first calving -36 to 42 months
• Calving interval – 15 to 16 months
• Lactation length averages 294 days (range 257 to 350 days)
• Milk yield – Under village condition :1300 kg
• Milk yield– Under commercial farms : 3600 kg
• Fat is around 4.8% (range 4.66 to 4.99%).
• Bullocks are fast, active and strong. Good for plough and cart purpose

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Upgrading Indigenous cattle of India

Breed Habitat/Main State Breeding Tract Districts Assembling Center Areas of demand Remarks
Hallikar Karnataka Tumkur, Hassan & Mysore Dodbalapur, Chickballapur, Harikar, Devargudda, Chikkuvalli, Karuvalli, Chittavadgi (T.N.) North Arcot (T.N.) Hindupur, Somaghatta, Anantpur (A.P.) Dharwar, North Kanara, Bellary (KT) Anantur & Chittur (A.P.), Coimbatore North Arcot, Salem (T.N.) Draught breed
Kangayam Tamil Nadu Erode Avanashi, Tirppur, Kannauram, Madurai Athicombu Southern Districts of Tamil Nadu Draught breed
Red Sindhi Pakistan All parts of India Dairy breed
Tharparkar Pakistan(sind) Umarkot, Naukot, Dhoro Naro Chor Balotra (Jodhpur), Puskar (Ajmer), Gujarat State Dairy breed
Vechur Kerala Vaikom, Mannuthy (Kerala State)

(Source: National Dairy Development Board)

Milk Breeds – Indigenous Breeds

Milking Breeds

The cows of these breeds are high milk yields and the male animals are slow or poor work animals. The examples of Indian milch breeds are sahiwal, Red Sindhi, Gir and Deoni The milk production of milk breeds is on the average more than 1600 kg per lactation

Red Sindhi Cow 

Red Sindhi Cow

Red sindhi is a distinguished milch breed of Upmahadweep.

It is mostly found in Karachi and Hyderabad districts of Pakistan. Some organized herds of this breed are also found in India in the states of Punjab, Haryana, Karnataka, Tamil Nadu, Kerala and Orissa. The original herd was established at Malir outside Karachi.

Lal Sindhi cattle are somewhat similar to Sahiwal and may also be related to Afghan and Gir cattle. Red Sindhi is one of the important dairy cattle breeds in Indian sub-continent.

Physical Characteristics:

• This breed has distinctly red color.
• Red shades vary from dark red to dim yellow. Though patches of white are seen on dewlap and sometimes on forehead, no large white patches are present on the body.
• In bulls, color is dark on the shoulders and thighs.
• Hair is soft and short, and skin is loose.
• Milk production is around 1, 840 kg(range 1, 100 to 2, 600 kg) and lactation length 296 days . Under good management conditions the Red Sindhi averages over 1700 kg of milk after suckling their calves but under optimum conditions there have been milk yields of over 3400 kg per lactation.
• Fat is around4.5%

Sahiwal Cow

Sahiwal Cow

The Sahiwal is one of the best dairy breeds of zebu cattle.

Though its original breeding tract lies in Montgomery (now Sahiwal) district of Pakistan, yet some herds are also found in India along the Indo-Pak border in Ferozepur and Amritsar districts of Punjab, and Sri Ganganagar district of Rajasthan,  Haryana, U.P, Delhi, Bihar and M.P.

Sahiwal breed is being utilized widely for improvement of local stock or for the purpose of initial crossbreeding. It is known to have been introduced into 17 other countries, besides Pakistan and India. These are: Mauritius, Kenya, Tanzania, Sierra Leone, Malaysia, the Philippines, Vietnam, Thailand, Myanmar, Bangladesh, Sri Lanka, Nepal, Brazil, Jamaica, Trinidad, Australia and New Zealand.

Physical Characteristics:

• Coat color is usually red, sometimes pale red or brown occasionally mixed with white spots is also seen.
• The Sahiwal is a heavy breed with symmetrical body and loose skin.
• Animals are long, deep, fleshy and comparatively lethargic.
• Horns are short and stumpy.
• Udder is generally large, bowl shaped, pliable, and firmly suspended from the body.
• Average milk yield is 2, 326 kg (range 1, 600 to 2, 750 kg).
• Average lactation length is 318 days (range 285 to 375 days).
• Fat is 4.8 to 5.1% (average 4.93%).
• Milk yield – Under village condition :1350 kg
• Milk yield   – Under commercial farms: 2100 kg
• Calving interval – 15 month

Gir Cow 

Gir Cow

The Gir is a famous milk cattle breed of India. The native tract of the breed is Gir hills and forests of Kathiawar including Junagarh, Bhavnagar, Rajkot and Amreli districts of Gujarat. The Gir animals are famous for their tolerance to stress conditions and resistance to various tropical diseases. Bullocks of this breed are used to drag heavy loads on all kinds of soil. Brazil, Mexico, USA and Venezuela have imported these animals where they are being breed successfully. These animals contribute significantly to the total milk production of Gujarat State. The Rabaris, Bharwads, Maldharis, Ahirs and Charans tribes are mainly involved in Rearing of Gir cattle. They move with their cattle from one place to another in search for grazing. The Gir animals are also kept at different Gaushalas (cow barns) in Gujarat State.

Physical Characteristics:

• Coat color of Gir animals varies from shades of red and white to almost black and white or entire red. Skin color is dominantly black but in a few animals it is brown, has red/white and black/white or completely red haired cows can be seen
• Forehead is prominent, convex and broad like a bony shield. This overhangs eyes in such a way that they appear to be partially closed and the animal shows sloppy appearance.
• Ears are long and pendulous and folded like a leaf.
• The tail is long and whip like.
• Hooves are black and medium-sized.
• Hair is short and glossy,
• Skin is loose and pliable
• Hipbones are prominent, the body is well proportioned, the udder in cows is well developed
• Age at first calving in Gir cows is 52.49 months
• Average lactation and 300 days milk yield in 378 Gir cows is 1775 and 1449 kg, respectively.
• Gir Cow Milk yield   – Under village condition : 900 kg
• Gir Cow Milk yield    – Under commercial farms: 1600 kg

Deoni

Deoni is an important dual-purpose breed of cattle in Maharashtra. These animals are mainly found in the Latur district and the adjoining area of Prabhani, Nanded and Osmanabad districts of the Marathwada region of Maharashtra. The name of the breed is derived from Deoni Taluk of the Latur district.

Physical Characteristics

• Deoni is a medium heavy animal. It is found in three color variations viz. Wannera (clear white with black colour at the sides of the face), Balankya (clear white with black spots on the lower side of the body) and Shevera (white body with irregular black spots).
• The body is moderately developed and symmetrical with distinct muscles.
• The colour of the head is black and white in Wannera and Shevera and completely white in the Balankya strain.
• The forehead is prominent, broad, slightly bulged and white in all the strains
• Ears are long and drooping with slightly curved tips
• Horns are medium, thick, apart and emerge from the sides of the poles, Tips of the horns are blunt
• Eyes are prominent, bright and alert with black eyebrows.
• The neck is short, strong and well developed. Dewlap is thick, pendulous, and muscular with folds. It is more pendulous in males than in females.
• The tail is long reaching below the hock with black and white switch.
• The udder is well attached and medium in .size with squarely placed black teats.
• The animals are docile and calm.
• Lactation milk yield in Deoni herds ranging from 800 to 1000 kg.
• Average Fat percent of 4.29 is observed in 100 samples of Deoni cow milk.

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Upgrading Indigenous cattle of India

Breed Habitat/Main State Breeding Tract Districts Assembling Center Areas of demand Remarks
Hallikar Karnataka Tumkur, Hassan & Mysore Dodbalapur, Chickballapur, Harikar, Devargudda, Chikkuvalli, Karuvalli, Chittavadgi (T.N.) North Arcot (T.N.) Hindupur, Somaghatta, Anantpur (A.P.) Dharwar, North Kanara, Bellary (KT) Anantur & Chittur (A.P.), Coimbatore North Arcot, Salem (T.N.) Draught breed
Kangayam Tamil Nadu Erode Avanashi, Tirppur, Kannauram, Madurai Athicombu Southern Districts of Tamil Nadu Draught breed
Red Sindhi Pakistan All parts of India Dairy breed
Tharparkar Pakistan(sind) Umarkot, Naukot, Dhoro Naro Chor Balotra (Jodhpur), Puskar (Ajmer), Gujarat State Dairy breed
Vechur Kerala Vaikom, Mannuthy (Kerala State)

(Source: National Dairy Development Board)