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विषैले दूध की कहानी से पर्दा हटा

अनेक लोगों के समान हम लोग भ स्वदेशी गोवंश को उपयोगी समझकर उसके पक्ष में प्रचार, प्रयास कर ह रहे थे। लगभग 5 वर्ष पूर्व ‘नैट’ से वास्ता पड़ा। संयोग की बात कहें या उस परम सत्ता का खेल, एक ऐसी साईट मिली जिससे पता चला कि अधिकांश विदेशी गऊएं ‘ए1’ नामक बीटाकैसीन प्रोटीन वाली है जो विषाक्त प्रभाव वाला और अनेक असाध्य रोग पैदा करता है। यूरोप की कुछ गऊएं ‘ए2’ नामक हानि रहित बीटा कैसीन प्रोटीन वाली बतलाई जाती हैं।

किन्तु किसी भी ‘सर्च इंजन’ ने यह नहीं बतलाया कि भारतीय गैवंश सर्वोत्तम है तथा ‘ए2’ प्रोटीन वाला है। जब हमें पता चला कि ब्राजील ने 40 लाख से अधिक भारतीय गैवंश (गीर, सहिवाल, रैड सिंधी) तैयार किया है तो विश्वास हो गया कि भारतीय गैवंश ‘ए2’ है। बाद में ‘यूट्यूब‘ में देखा कि अमेरीका व अनेक यूरोपीय देश ‘ब्रह्मामिन काऊ‘ के नाम पर शुद्ध भारतीय गोवंश (एच एफ, हॅाल्स्टीन, जर्सी आदि) हमें मंहगे दामों पर दे रहे है।

तभी से विषाक्त ‘ए1‘ के बारे में प्रदेशभर की गौशालाओ व वैज्ञानिको को बतलाने लगे। सरकार पर हमारे प्रयासों का कोई प्रभाव न पड़ना था, न पड़ा।

पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में गौ विज्ञान पर संगोष्ठी

अन्त में प्रभु प्रेरणा से सूझा कि शोध पत्र पठन और सेमिनार इसका समाधान हो सकता है। एक साथी बलदेव राज सूद के प्रयासों से सरकार से 2 लाख रुपये सेमिनार हेतु स्वीकृत हुआ। उन्ही के प्रयास से पालमपुर कृषि वि.वि. के कुलपति डॉ. एस के शर्मा का पूर्ण सहयोग मिला। गोरक्षण-संवर्धन परिषद के रामऋषि भारद्वाज व उनके साथी ललित जी ने आयोजन व्यवस्था सम्भाली, नीतिगत निर्णयों व जटिल समस्याओं को सुलझाने में रोहिताश कुठियाला का बड़ा सहयोग मिला। शिमला विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य अरुण दिवाकर नाथ बाजपेई ने खूब उत्साह बढ़ाया व लम्बी यात्रा करके मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। ‘सेमिनार आयोजन समिति‘ मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य के रूप में औद्यानिकी वि.वि. नौणी, सोलन के कुलपति डॉ. के. आर. धीमान का सहयोग मिला। आयोजन समिति के अध्यक्ष बने शूलिनी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पी. के. खोसला। पी. सी. कपूर (तत्कालीन सचिव पशुपालन विभाग) ने स्वीकृत राशि बढ़ाकर एक से दो लाख करना मान लिया।

एन. बी. ए. जी आर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेन्द्र कुमार सदाना ने तकनीकी परामर्श की जिम्मेवारी सम्भाली। स्मारिका प्रकाशन का जटिल-कठिन कार्य उन्होंने कुशलता से निभाया।

पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति व वैटनरी विभाग की पूरी टीम का अनापेक्षित सहयोग मिला। डॉ. ए. सी. वार्षणेय (अब मथुरा के कुलपति) डॉ. सी वार्षणेय (अब डीन है) आदि सबने सहयोग में कसर नहीं रखी। पंजीकरण का कार्य ‘आर्टआफ लीविंग’ के पुनीत कपूर व उनके साथियों ने सम्भाला। एक साथी देवानन्द गौतम अपनी गाड़ी लेकर निरन्तर साथ बने रहे व सम्भव सहयोग करते रहे। पालमपुर प्रैस से शारदान्द गौतम, प्रैस के प्रधान व अन्य सबका खूब सहयोग मिला।

नागपुर के गोविज्ञान केन्द्र-देवला पार के श्री सुनील मानसिंहका अनुभव पूर्ण सहयोग व मार्गदर्शन इस आयोजन की सफलता का एक स्तम्भ रहा।

पशुपालन विभाग के निर्देशक डॉ. डी. पी. मल्होत्रा संयुक्त निर्देशक डॉ. अश्विनी गुप्ता तथा डॉ. अशोक की टीम का भी भरपूर सहयोग मिला।

अन्ततोगत्व 25-26 मई 2012 को दो दिवसीय ‘गोविज्ञान’ पर राष्ट्रीय संगोष्टी सम्पन्न हुई। संगोष्टी में प्रस्तुत शोध पत्रों से स्पष्ट हो गया कि विदेशी गोवंश विषाक्त हे और स्वदेशी विषमुक्त, लाभदायक प्रोटीन वाला है। निर्देशक डॉ. मल्होत्रा मंच से बोले कि हम नीतियां बनाने वाले हैं, लगता है कि हमसे गलती हो गई है।

तब से लेकर आज तक चार निर्देशक सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पर यह सूचना (ए1, ए2) हिमाचल पशुपालन विभाग के निर्देशालय से निकलकर विभाग के शेष चिकित्सकों तक नहीं पहुंची है। सरकारी नीतियाँ भी जैसी की तैसी हैं। सारे देश व पहाड़ की श्रेष्ठ गऊओं को विषाक्त विदेशी सांडों के वीर्य के टीके लगाकर पीढ़ी दर पीढ़ी अधिकाधिक विषाक्त बनाया जाना निरन्तर जारी है।

हम सब साथियों को लगता है कि पशुपालन विभाग के वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, तकनीकी कर्मचारियों के इलावा यह जानकारी (ए1 तथा ए2 प्रोटीन के बारे में) आयुर्वेदिक व एलोपैथिक चिकित्सकों, कृषि व औद्यानिकी वैज्ञानिकों सहित जागरूक नागरिकों, प्रंशासकों, नेताओं समाजसेवियों तक पहुंचनी चाहिए।

हम सबका विश्वास है कि परिवर्तन का समय बहुत पास है। हमारे प्रयास व्यर्थ जाने का कोई कारण नहीं, सफलता सुनिश्चित है। इस अभियान में आप सबका विश्वास, शुभकामनाएं व सहयोग हमारे साथ रहेगा, इसमें हमें सन्देह नहीं।

आपका,
वैद्य राजेश कपूर
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