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अग्निहोत्र कृषि

अग्निहोत्र कृषि पूर्ण प्रकट विज्ञान है। वायुमंडल पवित्र करने के लिए नियमित रूप से अग्निहोत्र करने की हमारे यहाँ प्राचीन परंपरा रही है। अग्निहोत्र यज्ञ विधान का मूल तत्व है। यज्ञ का अभिप्राय अग्नि द्वारा घर एवं वायुमंडलको पवित्र करने की प्रक्रिया से है। इस प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल एवं वातावरण को प्रकृति की स्वाभाविक शक्तियों, ज्योतिषीय संयोजनों एवं मंत्र शक्ति से ऐसे परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है जिससे सूर्य और चन्द्रमा से प्राप्त होने वाली उच्च शक्ति युक्त ब्रह्मांडीय उर्जा को और अच्छे ढंग से ग्रहण किया जा सके। यह प्रक्रिया पृथ्वी के उर्जा चक्र को इस प्रकार नियंत्रित करती है, जिससे यह प्रकृति के अनुरूप प्राणिमात्र के कल्याण के लिए प्रवाहित होती रहे।

आवश्यक सामग्री एवं नियम :

Angnihotra

  1. विशिष्ट आकार(पिरामिड) का ताम्र अथवा मिट्टी का पात्र
  2. गाय के गोबर से बनाये गये पतले उपले
  3. गाय का घी
  4. बिना पालिश का अक्षत चावल
  5. सूर्योदय तथा सूर्यास्त का समय
  6. विशिष्ट मंत्रोच्चारण के साथ आहुतियाँ

ताम्र पिरामिड :

ताम्र पिरामिड अपने विशिष्ट आकृति के कारण विभिन्न प्रकार की उर्जा को ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता रखता है। सूर्यास्त के समय ये उर्जाएं इस विशिष्ट आकृति से विलग होकर आकाश में समाहित हो जाती है।

अक्षत (चावल) :

पालिश करने से चावल के पोषकीय गुणों का ह्रास होता है। अतएव चावल के वही दाने प्रयोग करने चाहिए जो की टूटे न हो। यदि जैविक विधा द्वारा उत्पादित तथा गाव में मसूल तथा काडी द्वारा निकला गया चावल उपलब्ध हो सके तो उत्तम रहेगा।

गाय का घी :

अग्निहोत्र के लिए 50 ग्रा. घी 1 महीना चलता है क्योकि आपको एक समय के अग्निहोत्र के लिये केवल 1 बूंद घी लगता है। घी एक महत्वपूर्ण एवं औषधीय गुणों से भरपूर सामग्री है। अग्निहोत्र में प्रयोग के समय यह अदृश्य उर्जाओं के वाहक के रूप में काम करती है। शक्तिशाली उर्जा इसमे बँध जाती है। चावल के साथ दहन के समय इससे ओक्सिजन, इथोलिन ऑक्साइड, प्रोपाईलिन ऑक्साइड एवं फार्मेल्डिइड उत्पन्न होती है। फार्मेल्डिहाइड जीवाणुओं के खिलाफ प्रतिरोधी शक्ति प्रदान करते है। प्रोपइलिन ऑक्साइड वर्षा का कारण बनती है।

गाय के गोबर से बने शुष्क उपले (कंडे) :

गाय के उपले (कंडे) शुद्धता से बनाये गये हों यानि उनमें कही भी कंकड, कचरा, पालिथीन आदि न हों, कंडे किसी भी साफ सुथरी जगह पर बनाये जा सकते हैं। गाय के ताजे गोबर से पतले उपले बनाकर धुप में सुखा लिए जाय। अग्निहोत्र की आग इन्ही सूखे उपलों से तैयार की जाय। गाय के गोबर में एक्टिनोमिइसिटीज नामक सूक्ष्म जीव काफी मात्रा में पाए जाते है।

भारत एवं अन्य देशों जैसे अमेरिका, यूरोप एवं एशिया के विभिन्न देशों में गाय के गोबर को दावा के रूप में प्रयोग के उल्लेख मिलते है।

अग्निहोत्र की आग तैयार करने की विधि :

AgnihotraAgnihotra

ताम्र पिरामिड में सर्वप्रथम एक चपटे आकार का उपला रखते है। उसके ऊपर उपलों के टुकड़ों को इस प्रकार रखा जाता है जिससे पात्र के मध्य वायु का आवागमन सुचारू रूप से हो सके। उपले के एक टुकड़े में गाय का थोडा घी लगाकर अथवा कपूर की सहायता से अग्निदाह किया जाता है। शीघ्र ही रखे हुए उपले भी आग पकड़ लेगी। आवश्यकता पड़ने पर हस्तचालित पंखे का प्रयोग अग्निदाह करने के लिए किया जा सकता है।

सावधानी:

अन्य किसी भी प्रकार का तेल का प्रयोग न करे अथवा मुह से फूंककर अग्निदाह न करें।

विधि:Agnihotra

मान लीजिए कि आज तारीख है 1 जुलाई 2014, सूर्यास्त का समय है 7.06 मिनट! तो इस समय से 10 मिनट पहले तांबे के पात्र में गाय के गोबर के कंडे में अग्नि प्रज्जवलित कर अग्निहोत्र समय से दो मिनट पहले अखंड अक्षत (बिना टूटे चावल) चावल के 8-10 दानों को गाय के घी में मिलाकर अथवा बायीं हथेली में लेकर गाय के घी की कुछ बूंदे उस पर छिड़ककर अच्छी प्रकार मिला लें और दो भाग कर लें जैसे ही घडि में 7.06 मिनट हो,  आहुति के दो भाग में से एक भाग को दायें हाथ  के अंगूठे, मध्य अनामिका व छोटी अंगुली से उठा लें और निम्न दिए गये मंत्र बोलें।

इस प्रक्रिया का प्रारंभ सूर्योदय के समय किया जाता है और पुनः सूर्यास्त के समय दोहराया जाता है। यह घर एवं खेत / फार्म दोनों पर ही किया जाता है।

यह मन्त्र सभी लोग कहे आहुति सिर्फ एक ही व्यक्ति देगा।

अग्नयॆ स्वाहा (स्वाहा कहतॆ हुए पात्र मॆं पहली आहुति डाल दॆवॆं) तथा शॆष मन्त्र बॊलॆं,
अग्नयॆ इदं न मम अब दूसरी आहुति उठायॆं और दूसरा मंत्र बॊलॆ‍
प्रजापतयॆ स्वाहा  (स्वाहा कहतॆ हुए पात्र मॆं दूसरी आहुति डाल दॆवॆं) ,
प्रजापतयॆ इदं न मम !

सूर्योदय के समय निम्न मंत्रोच्चारण करे   Agnihotra mantra that is recited at sunrise.

पहला मंत्र:

सूर्याय स्वाहा   (स्वाहा कहते हुए पात्र में पहली आहुति डाल दे) तथा शेष मन्त्र बोले,
सूर्याय इदम् न मम्   (अब दूसरी आहुति उठायें और दूसरा मंत्र बोले)

दूसरा मंत्र:

प्रजापतये स्वाहा  (स्वाहा कहते हुए पात्र में आहुति डाल दे) तथा शेष मन्त्र बोले,
प्रजापतये इदम् न मम्

सूर्यास्त के समय निम्न मंत्रोच्चारण करे  Agnihotra mantra that is recited at sunset.

पहला मंत्र:

अग्नेय स्वाहा
अग्नेय इदम् न मम् (प्रथम आहूति के समय)

दूसरा मंत्र:

प्रजापतये स्वाहा
प्रजापतये इदम् न मम् (द्वितीय आहूति के समय)

स्वाहा उच्चारण के साथ आहूतिया अर्पित की जाय।

सावधानी:

समय की पाबंदी (स्थान विशेष का सूर्योदय तथा सूर्यास्त) का समय शांत चित्त, भावना पूर्वक आहुति देने के बाद लौ बुझने तक बैठे रहना चाहिए। आहुति भस्म होने मे मुश्किल से दो मिनट लगेंगें। इन दो मिनटों मे आप अपनि रीढ की हड्डी को सीधा रखकर गहरी श्वास ले। दृष्टि अग्नि पर जमाये रखने का प्रयत्न करे तथा आहुति भस्म हो जाने पर उठ जाये।

अग्निहोत्र भस्म को अगले दिन एकत्रित कर मिट्टी के पात्र में भंडारित किया जाना चाहिए।

व्याहृती होम :

यह अग्निहोत्र की तरह नित्य नहीं बल्कि नैमित्तिक है। हर कृषि सम्बन्धी कार्य के पूर्व व् पश्चात् इसे किया जाय यही इसका समय है। अग्निहोत्र पात्र के निकट उसी प्रकार के दुसरे पात्र में व्याहृति होम करने के लिए गाय के गोबर के कंडे जलाए। इस होम के लिए चार वेद मंत्र है जो इस प्रकार है।

भू: स्वाहा, अग्नेय इदम् न मम्।
भुव: स्वाहा: वायवे इदम् न मम्।
स्व: स्वाहा, सूर्याय इदम् न मम्।
भू र्भुव: स्वः स्वाहा, प्रजापतये इदम् न मम्।

प्रत्येक मंत्र कहते समय स्वाहा के उच्चारण पर सिर्फ एक बूंद गाय का घी अग्नि में डाले। इस यज्ञ में घी के अलावा अन्य किसी भी पदार्थ की आहुति नहीं देनी है। सिर्फ चार बूंद गाय का घी। भू:, भुव:, स्वः इन तीनो शब्दों का आशय क्रमश: भूमण्डलता, वायुमण्डल और आकाश है। अन्तमें चौथी आहुति इन तीनों व्यहृतियों का उच्चारण एक साथ करके जो अग्नि, वायु और सूर्य के जनक है उन प्रजापति इश्वर के प्रति कृताज्ञता व्यक्त की जाती है। कुछ लोग इसे मंगल हवन भी कहते है। इसका उद्देश भी मंगलकामना ही है।

ये चार बूंद घी जलकर वायुरूप होने तक यशास्थान बैठे रहना चाहिए। शीतल होने के पश्चात् अग्नि होम के पात्र को उठाकर उचित स्थान पर रखा जा सकता है।

त्र्यम्बकम् यज्ञ :

अग्निहोत्र कृषि में संधिकालो का बड़ा महत्व है। सूर्योदय-सूर्यास्त के संधिकालों मैं अग्निहोत्र किया जाता है, उसी तरह पाक्षिक संधिकालों अर्थात् अमावस्या-पौर्णिमा को भी विशिष्ट यज्ञ किया जाता है। इस यज्ञ का सिर्फ एक ही मंत्र है वह इस प्रकार है।

ॐ त्र्यम्बकायै यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारूकमिव बन्धनान् मृत्योर मुक्षीय मामृतात्। स्वाहा।

पूरा मंत्र बोलकर “स्वाहा” बोलते समय प्रज्ज्वलित अग्नि में सिर्फ एक बूंद गाय का घी डालना है। पुन: मंत्र बोलना है और स्वाहा पर एक बूंद घी डालना है। ऐसा लगातार करना है। घर के सभी सदस्य इस मंत्र को याद कर ले, तो सिर्फ चार लोग एक घंटा दे कर ४ घंटे का यज्ञ संपन्न कर सकते है। इसी प्रकार चार घंटे के यज्ञ के लिए २०० ग्राम घी पर्याप्त है। कम से कम चार घंटे तो यज्ञ खेत में ही होना चाहिए। यदि अधिक समय उपलब्ध हो सके तो १२ घंटे अथवा २४ घंटे का करना अच्छा रहता है। दीर्घकालीन यज्ञ करते समय ध्यान रहे की सायं प्रातः अग्निहोत्र का समय उपस्थित होने पर यज्ञ को रोक दे। समय पर अग्निहोत्र करे और आहुति भस्म होते ही पुन: महामृत्युंजय यज्ञ शुरू कर दे। महामृत्युंजय यज्ञ हेतु उत्तम स्थान का उपयोग किया जाना चाहिए।

इस यज्ञके लिए ईंटों से जमीन में भी चौकोर पाँव बनाया जा सकता है। पात्र में राख अधिक होने पर उसे निकालते रहना चाहिए, और नये कंडे लगाकर अग्नि लगातार इतना प्रज्वलित रखना चाहिए की एक बूंद आहुति से लौ या धुँआ निकालता रहे।

यह यज्ञ भी प्रदूषक, हानिकारक तत्वों और रोगाणुओं को प्रतिबंधित करता है। इसे अनेक लोग मिलकर सामूहिक रूप से कर सकते है। आहुति एक व्यक्ति को ही देनी है अन्य मंत्रोच्चारण साथ-साथ करें।

यज्ञ चाहे चार घंटे का हो या २४ घंटे का त्र्यम्बकम् यज्ञ की शुरूआत व्याहृति होम से करते है और यज्ञ का समापन भी व्याहृति मन्त्रों से होम करके किया जाता है। यदि अमावस्या-पूर्णिमा को यज्ञ न कर सकें तो खेती में हल-बखर, बोनी, कटनी आदि कृषि कार्य चलने तक तो अवश्य ही करे, इसका फसल पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। नित्य अग्निहोत्र और समय-समय पर ये दो नैमित्तिक यज्ञ और इनकी भस्म यही अग्निहोत्र कृषि का आधार है। यही वास्तविक कृषि पद्धति है।

(साभार: प्रो. दुबे)

अग्निहोत्र ताम्र पात्र में जलती हुई अग्नि एवं मंत्रोच्चारण से उत्पन्न गूंज / प्रतिध्वनि से वातावरण पर ऐसा प्रभाव पड़ता है जिससे की पौधों की कोशिकाओं, मानव एवं प्राणिमात्र को जीवन शक्ति मिलाती है। साथ ही मानव के जनन चक्र को सुचारू ढंग से चलने में मदद भी मिलाती है। अग्निहोत्र की भस्म (राख) का प्रयोग जीवनाशी, एंटी कोआगुलेंट एवं विभिन्न जीवों में ऊतक संकुचन प्रभावों को उत्पन्न करने में सफलतापूर्वक किया जाता है।

Agnihotra Effects on Environment.Agnihotra Statestics

अग्निहोत्र प्रक्षेत्र के मध्य तथा त्र्यम्बकम् अन्यत्र स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से झोपड़ी बनाकर सम्पादित किया जाना चाहिए। व्यवस्था सुलभ होने पर प्रत्येक दिन अग्निहोत्र समयानुसार, चार घंटे नियमित त्र्यम्बकम् तथा अमावस्या और पौर्णिमा को १२ अथवा २४ घंटे संपन्न करने पर आशातीत सफलता मिलती है। इस प्रकार के प्रयास तपोवन महाराष्ट्र में किये जा रहे है।

उपयोग विधिया:

२०० ग्राम भस्म (राख) + २५० मिली. गोमूत्र २५ दिनों तक खमीर हेतु रखे

पानी द्वारा (१:४-५)मिला करके बिज/पौध उपचार हेतु या रोग / किट प्रबंधन हेतु छिड़काव के लिए इस्तेमाल करें।

अग्निहोत्र से निकली चार गैस की पहचान हो सकी है।

  1. इथिलिन ऑक्साइड
  2. प्रोपिलीन ऑक्साइड
  3. फर्मेल्डिहाईद
  4. बिता लेक्टोन

आहुती देने के बाद गोघृत से एसितिलीन निर्माण होता है। यह एसितिलीन प्रखर उष्णता की ऊर्जा है जो दुर्गन्धयुक्त वायु को अपनी ओर खींचकर शुद्ध करती है।

फार्म प्रक्षेत्र पर यदि किसी कारणवश नियमित रूप से अग्निहोत्र किया जाना सम्भावित न होने पर एक की.ग्राम भस्म का छिड़काव प्रति एकड़ किया जा सकता है।

भस्म का प्रयोग अनाज तथा दलहन के भण्डारण हेतु भी किया जा सकता है।

फसल पर व्याधि संक्रमण होने पर १०० लीटर पानी में दो की.ग्रा. भस्म + ५ लीटर गोमूत्र को अच्छी प्रकार मिलाकर २-३ दिन बाद छिड़काव किया जाय।

तीसरे दिन भस्म नीचे पात्र की तलहटी में बैठ जाती है। बिना पात्र हिलाये घोल निथारकर अथवा कपड़े से छान कर छिड़काव किया जाय।
उपरोक्त घोल को छिड़काव पूर्व १० मिनट तक घड़ी की दिशा तथा विपरीत दिशा में भंवर बनाकर मिलाने से प्रभाव में गुणात्मक असर पड़ता है।

मटर, चूना आदि में इल्ली का प्रकोप दिखाई पड़ने पर २०० लीटर ड्रम में पानी भर कर १० की.ग्रा. अग्निहोत्र भस्ममिलाकर २४ घंटे बाद कपड़े से छानकर स्प्रे मशीन द्वारा छिड़काव प्रभावी देखा गया है।

मौसमी फसलों में २-३ छिड़काव किया जाना चाहिए।

(साभार: पूज्य श्री बसंत परन्जपे तथा नलिनी माधव )

(Image and Sound Source: SSRF)

कुछ अन्य

  • अग्निहोत्र कृषि है महान,बनायें सुखी समृद्ध किसान‌
    वस्तुतः कृषि-कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है इसीलिये किसान को अन्नदाता कहते है। सारे व्यवसाय कृषि उपज पर आधारित हैं और कृषि हमारे अर्थशास्त्र की रीढ़ है परन्तु वर्तमान में किसान हताश है, परेशान और दुखी है। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं कॆ दुष्चक्र में फँस कर वह बर्बादी की राह पर है, खेत की उर्वरा शक्ति का ह्रास, खेती की बढ़ती लागत और जहरीला अन्न, फल, भाजी बचने की मजबूरी ‍- यही बर्बादी है। यह जहरीली दवा केवल पेट में ही नहीं पहुँचती, बल्कि संपूर्ण वातावरण को जहरीला बनाती है। यही अग्निहोत्र कृषि पद्धति जो प्राण ऊर्जा विज्ञान (Bio energy) पर आधारित है। पर्यावरण में अमृत संजीवनी घोल देती है। आज आवश्यकता यही है कि ऐसी खेती करें जो पैसा भी दे, संतुष्टि भी दे और सत्कर्म भी हो।
  • एक सर्वे के अनुसार प्रतिवर्ष 2000 किस्म की वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी इस भूमंडल से समाप्त होते जा रहे हैं। वनों की अनियंत्रित कटाई, रासायनिक खाद एवं छिड़काव द्वारा भूमि की उर्वरता से संबंधित आँकड़ों के अनुसार योरप की चालीस प्रतिशत भूमि कृषि योग्य नहीं रही है।आगामी पाँच वर्षों में पृथ्वी का एक तिहाई हिस्सा कृषि के अयोग्य होने का अनुमान है। इन प्रदूषणजनक स्थितियों का सामना करने के लिए वेदों की देन है ‘अग्निहोत्र’। अग्निहोत्र, जो कि आज की परिस्थितियों में वैज्ञानिक कसौटियों पर उतरा है। इसके आचरण से न केवल शरीर स्वस्थ एवं वातावरण शुद्ध होता है बल्कि हृदय रोग, दमा, क्षय रोग, मानसिक तनाव आदि घातक रोगों से भी छुटकारा मिलता है।
  • राजस्थान में कई अग्निहोत्र प्रचार केन्द्र हैं, यहाँ निःशुल्क जानकारी दी जाती है। इस अभियान से जुड़े सारे कार्यकर्ता निःस्वार्थ भावना से जगह-जगह प्रदर्शनियाँ लगाकर जनसाधारण को इस आश्चर्यजनक वैदिक खजाने की जानकारी दे रहे हैं। इस अभियान को जनआंदोलन का रूप दिया जाए। वैज्ञानिकों को जाँचकर इस अलौकिक शक्ति के प्रायोगिक परिणामों की चर्चा करनी चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं संगठनों को भी इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। अग्निहोत्र का कोई भी विकल्प नहीं है। यही एक सूक्ष्म एवं सुलभ वैदिक विधि है जिससे हम मानव जीवन को जाग्रत कर उसे उसकी छिपी हुई शक्ति का आभास करा सकते हैं।
  • केंद्रीय उपोष्ण बागवानी के पूर्व निदेशक एवं औद्यानिक मिशन भारत सरकार के पूर्व सलाहकार एवं कृषि वैज्ञानिक डा. आरके पाठक ने बताया कि अग्निहोत्र से सूर्य एवं चंद्रमा से विशेष प्रकार की ऊर्जा संरक्षित होती है, जो मिंट्टी को विभिन्न तत्वों से परिपूर्ण कर संस्कारित करती है तथा पेड़-पौधों की सेहत को संरक्षित व संव‌िर्द्धत करती है। मंत्रोच्चारण से होने वाला स्पंदन भी बहुत ही लाभप्रद होता है। अग्निहोत्र कृषि का सफल प्रयोग महाराष्ट्र के जलगांव व धुलिया में, मध्यप्रदेश के खरगौन जिला स्थित महेश्वर में, हरिद्वार स्थित शांति कुंज सहित कई जगह किया जा रहा है। आस्ट्रिया, आस्ट्रेलिया, पेरू, अर्जेटीना, जर्मनी व पोलैंड सहित दुनिया के 71 देशों में अग्निहोत्र कृषि व होमाथेरेपी पर काम चल रहा है। भारत में कृषि विश्वविद्यालय पालम, धारवाड़ व तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय उडुप्पी, देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार में इस पर व्यापक शोध हुए हैं।

अग्निहॊत्र सम्बन्धी प्रश्न‌

क्या यदि हमारा अग्निहॊत्र किसी कारणवश एक, दॊ या कुछ दिनॊं कॆ लियॆ बन्द हॊ जायॆ तॊ कॊई विपरीत प्रभाव तॊ नहीं है ?

बिलकुल नही, सर्वप्रथम तॊ यही प्रयास करॆं कि अग्निहॊत्र बन्द न हॊनॆ पायॆ पर फिर भी यदि किसी कारण सॆ अग्निहॊत्र कुछ समय कॆ लियॆ ना हॊ तॊ बिल्कुल कॊई भी पूर्वाग्रह न रखतॆ हुए पहलॆ जितनॆ ही उत्साह सॆ पुन: अग्निहॊत्र शुरु कर दॆ‍।

अग्निहॊत्र की शॆष बची राख (भस्म) का क्या करॆं ?

अग्निहॊत्र करनॆ कॆ बाद पात्र को न छुएं। कम सॆ कम सुबह कियॆ अग्निहॊत्र कॊ शाम कॊ ही छुए, ऎसा प्रयास करॆं ताकि वह भस्म अधिक प्रमाण मॆं औषधि कॆ गुणॊं सॆ भरपूर हॊ सकॆ। अग्निहॊत्र की भस्म महाऔषधि है, यह कभी भी ना भूलॆं। शॆष बची भस्म कॊ किसी भी साफ काँच की बरनी या प्लास्टिक की बरनी मॆं रखॆ (प्रयास करॆ कि धातु आदि की बरनी मॆं न रखॆं ताकि भस्म कॆ औषधि गुण बरकरार रह सकॆं) और किसी भी रॊग, चॊट, दंश आदि कॆ उपचार मॆं सफलतापूर्वक उपयॊग कर सकतॆ है। (माधवाश्रम् सॆ प्रकाशित “अग्निहॊत्र चिकित्सा पुस्तक एवं औषधि निर्माण” दॆखॆ )

मुझॆ अपनॆ रॊजमर्रा कॆ कार्यक्रमॊं कॆ चलतॆ समय ही नही मिल पाता है तॊ मैं कैसॆ अग्निहॊत्र करुं ?

अग्निहॊत्र इस युग की संजीवनी बूटि है। यह आपकॆ जीवन कॊ तनाव मुक्त, आनन्दमय और उल्लास सॆ परिपूर्ण कर सकता है। अग्निहॊत्र को घर का कॊई भी व्यक्ति और किसी भी जाति पाति, वर्ग, उम्र, वर्ण, रंग का हॊ वह अग्निहॊत्र का अधिकारी है। यदि किसी कारण सॆ आप दॊनॊ समय अग्निहॊत्र नही कर पा रहॆ हॊ सुबह या शाम घर मॆं किसी भी परिवार कॆ सदस्य या घर मॆं काम करनॆ वालॆ नौकर या आपकॆ पडौसी भी आपकी अनुपस्थिति मॆं अग्निहॊत्र कर सकतॆ है। यह आप स्वय्ं तय करॆं, सन्कल्प करॆं, अग्निहॊत्र दॊनॊ समय हॊगा।

क्या बिना स्नान कियॆ अग्निहॊत्र किया जा सकता है ?

वैसॆ जितना आपकॆ शरीर का अणु रणु शुद्ध हॊगा उतना ही अधिक प्रमाण मॆ अग्निहॊत्र का प्रभाव आपकॆ मन व शरीर पर हॊगा यदि किसी कारणवश आप रॊगग्रस्त है या आपकॊ आदत नही है तॊ आप बिना नहाए अग्निहॊत्र कर सकतॆ है।

मैनॆ पुस्तकॊ मॆं ऎसा पढा है कि अग्निहॊत्र समय पर ही करना हॊता है। अत: मै रॊजाना टी0 वी0 सॆ अपनी घडी मिलाता हूं। तॊ क्या यह सही है ?

अग्निहॊत्र मॆ‍ समय की पाबन्दी यह नयॆ अग्निहॊत्र करनॆ वालॊं कॆ लियॆ सबसॆ कठिन नियम जान पडता है । पर यह कठिन नही है। अग्निहॊत्र जितना अधिक समय पर हॊगा उतना ही आप लाभान्वित हॊंगॆ। रॆडियॊ टाईम सबसॆ उप्युक्त रहता है क्यॊकि रॆडियॊ पर आनॆं वाली बीप् बीप् यह परमाणु घडी का समय हॊता है। जॊ अग्निहॊत्र कॆ लियॆ सबसॆ श्रॆष्ठ माना जाता है। चूँकि आल इंडिया रॆडियॊ और विविध भारती पर रॊजाना समाचार कॆ पहलॆ बीप् बीप् की ध्वनि आती है उसमॆं सॆ जॊ आखिरी की बीप् सॆ आप अपनी घडी मिला लॆं। साथ ही हर दॊ या तीन दिन मॆँ उसॆ पुन: मिलातॆ रहॆ।

अग्निहॊत्र किस दिशा मॆं करना उपयुक्त रहता है ?

अग्निहॊत्र करनॆ कॆ लियॆ कॊई विशिष्ट दिशा नही रहती है। आप अग्निहॊत्र कॊ घर, आँगन या घर की छत आदि पर किसी भी दिशा मॆँ कर सकतॆ हैं।

मै नियमित अग्निहॊत्र करती हूं पर अग्निहॊत्र कॆ समय लौ नही निकल पाती है। घर मॆं धुआँ ही धुआं हॊ जाता है। कृपया मार्गदर्शन दॆं।

आप जॊ अग्नि जलातीं है/ जलातॆ है उसमॆं या तॊ एक मिनिट पूर्व ही आप अग्नि जलाकर आप तुरन्त ही आहुति डाल दॆतॆ/ दॆती हॊगॆ/ हॊंगी या बरसात का समय हॊगा (ध्यान रखॆ बारिश कॆ समय कम सॆ कम 15 मिनिट पूर्व अग्नि प्रज्वलित करॆ) या कंडॊ की रचना ढंग सॆ नही हॊती हॊगी।

अग्निहॊत्र करनॆ कॆ बाद अग्निपात्र कॊ धॊ लॆना चाहियॆ कि नही ?

जब आप अग्निहॊत्र करतॆ है तॊ अग्निहॊत्र कॆ पश्चात अग्निपात्र ब्रम्हान्डीय विकिरणॊं कॊ फैलाता है। अग्निपात्र कॊ किसी भी रसायन या साबुन इत्यादि सॆ न धॊयॆ। ऐसा करनॆ सॆ अग्निपात्र कॆ कार्य प्रणाली मॆ बाधा पडती है। अत: सबॆरॆ या शाम कॊ अग्निहॊत्र कॆ पहलॆ पात्र कॊ किसी साफ कपडॆ सॆ या हाथॊं सॆ साफ कर लॆं।

अग्निहॊत्र कृषि कॆ लाभ बतायॆं ?

अग्निहॊत्र कृषि यानि वातावरण कॊ शुद्ध और समृद्ध बनाना ताकि वहा लगॆ पॆड, पौधॆ और फसल रॊगमुक्त हॊ और अग्निहॊत्र की भस्म कॊ भूमि मॆं डालना जिससॆ पौधॊं की जल व पॊषक तत्वॊं की धारण क्षमता कॊ उन्नत हॊ। यही अग्निहॊत्र कृषि है।

अग्निहॊत्र मॆं अग्नि कॊ कितनॆ समय पहलॆ सुलगाना चाहियॆ ?

अग्निहॊत्र कॆ समय मौसम कैसा है यानि यदि बारिश का समय हॊगा तॊ कम सॆ कम 15 मिनिट पहलॆ अग्नि जलायॆं, यदि ठँड का समय है तॊ 6 मिनिट पहलॆ और यदि गरमी का मौसम है तॊ 4 या 5 मिनिट क‍‍ण्डॊं कॊ जलनॆ कॆ लियॆ पर्याप्त हैं।

अग्निहॊत्र करनॆ कॆ बाद क्या करॆं ?

अग्निहॊत्र आपकॊ शुद्ध व स्वस्थ वातावरण दॆता है। आपकॊ कॆवल यही करना है कि अग्निहॊत्र कॆ बाद दॊ मिनिट कॆ लियॆ वहा गहरी श्वास लॆतॆ हुए बैठना है। उसकॆ उप्रान्त आप पूजा,प्रार्थना, यॊगासन, प्राणायाम, ध्यान आदि कुछ भी कर सकतॆ है । आप अग्निहॊत्र कॆ बाद जॊ भी करँगॆ आपको उसका अधिक लाभ ही मिलॆगा।

मै नियमित पिछलॆ 2 वर्ष सॆ अग्निहॊत्र कर रहा हूं पर मॆरा टाईम टॆबल (समय सारिणी) खॊ जानॆ सॆ अग्निहॊत्र बन्द हॊ गया है। अब मै समय सारिणी कहां सॆ लूं ?

आप हमॆं ई मॆल कर सकतॆ है तथा माधवाशम कॆ पतॆ पर पत्र भॆज क समय सारिणी मंगवा सकतॆ है।

किसी कारणवश मॆरा मिट्टी का पात्र टूट गया है तॊ क्या मै बाजार सॆ ताम्बॆ का पात्र लाकर उसमॆं अग्निहॊत्र कर सकती हूं।

अग्निहॊत्र मुख्यत: दॊ ही प्रकार कॆ पात्रॊं मॆं किया जाता है। ताबॆं का या मिट्टी का निश्चित आकार का पात्र। चूंकि अग्निहॊत्र मॆं ताबॆं का पात्र का ताम्बा धातु माध्यम (catalyst) का काम करती है। बाज़ार मॆं मिलनॆ वालॆ ताम्बॆ कॆ पात्र अशुद्ध व कडॆ लगॆ हुए हॊतॆ है तथा निश्चित आकार कॆ नही हॊतॆ है जॊ कि अग्निहॊत्र कॆ लियॆ उपयुक्त नही है। अत: आप खुद माधवाश्रम आकर या किसी परिचित सॆ मंगवायॆं या माधवाश्रम कॆ पतॆ पर मनीआर्डर भॆज कर भी ताम्रपात्र मंगवा सकती है।

क्या अग्निहॊत्र कॆ पात्र का कॊई निश्चित आकार है ?

बिल्कुल अग्निहॊत्र पात्र विशिष्ट आकार सॆ बना है। इसकी लम्बाई 10 अंगुल व ऊचाई 7 अंगुल है। पात्र का आकार 14.5X14.5 सॆ0मी0 है। ऊंचाई 6.5 सॆ0मी0 है तथा पात्र का तला 5.25X5.25 सॆ0मी0 है

मैं अग्निहॊत्र कॆ साथ साथ अन्य हवन भी करता हूं तॊ क्या मैं अन्य किसी भी हॊम\हवन कॊ अग्निहॊत्र कॆ पात्र मॆ कर सकता हूं। बतायॆं ?

अग्निहॊत्र की पाँच नियम है और पाँचॊं ही अग्निहॊत्र का आधार है या यूं कहॆं कि अग्निहॊत्र की विधियां अग्निहॊत्र का एक फार्मूला है अगर आप किसी भी फार्मूलॆ मॆ सॆ किसी एक तत्व कॊ निकालकर किसी अन्यत्र इस्तॆमाल करॆँगॆ तॊ वह कार्य या विधि सफलतापूर्वक नही हॊगी। अग्निहॊत्र कॆ पात्र कॊ किसी भी अन्य यग्य कॆ लियॆ प्रयॊग न करॆं। अग्निहॊत्र कॆ पात्र मॆं कॆवल अग्निहॊत्र करॆं।

गाय का शुद्ध घी हमारॆ यहां उपलब्ध‌ नही है फिर हम घी की व्यवस्था कैसॆ करॆं ?

बाज़ार मॆं शुद्ध घी मिलना बहुत मुश्किल है। आप दॆखॆ कि आप जहां रहतॆं है वहां आस पास कॊई गौशाला है क्या या फिर कॊई गौपालक आस पास रहता हॊ तॊ गाय का दूध 1 लीटर अपनॆ सामनॆ निकलवाकर उसका दही जमाकर रख दॆं। अगलॆ दिन मथनी सॆ मथकर मक्खन निकाल दॆं। इस मक्खन कॊ गर्म करनॆ पर आप 40 सॆ 50 ग्राम तक गाय का शुद्ध घी पा सकॆंगॆ। इतना घी लगभग 1 महीनॆ कॆ लियॆ पर्याप्त है।

अग्निहॊत्र मन्त्र कॆ उच्चारण मॆं कॊई गलती हॊ जायॆ तॊ क्या करॆं ?

अगर अग्निहॊत्र मन्त्र कॆ उच्चारण मॆं गलती हॊ भी जायॆ तॊ कॊई चिंता की बात नही है अग्निहॊत्र शुरु करनॆ पर अक्सर कुछ गलतियां हॊनॆ की संभावना रहती है आप माधव आश्रम द्वारा प्रकाशित अग्निहॊत्र पुस्तक पढॆ और सुबह शाम कॆ अग्निहॊत्र करतॆ समय पुस्तक अपनॆ समक्ष रखकर ही अग्निहॊत्र करॆ तथा अपनॆ खाली समय मॆं अग्निहॊत्र कॆ दॊ मन्त्रॊं कॊ कँठस्त करनॆ का प्रयास करॆ लगभग 15 दिनॊं कॆ भीतर आप मन्त्र याद कर लॆंगॆ।

अग्निहॊत्र यदि मै शुरु करू तॊ मॆरा क्या फायदा हॊगा ?

अग्निहॊत्र करनॆ सॆ सारा फायदा आप ही का है अग्निहॊत्र कॆ संपूर्ण फायदॆ कॆ लियॆ अग्निहॊत्र कॆ पाँचॊ नियमॊ का पालन हॊना जरुरी है। उदाहरण कॆ लियॆ अग्निहॊत्र कॆ निम्न फायदॆ हॊतॆ हैं। ‍‍‍‍‍

1. वातावरण शुद्ध हॊता है
2. अग्निहॊत्र करनॆ सॆ बच्चॊं कॆ मन, शरीर और बुद्धि का विकास हॊता है।
3. अग्निहॊत्र आपकॆ पालतू जानवरॊं की रॊगॊ बिमारियॊं आदि सॆ रक्षा करता है और उनकॆ व्यवहार कॊ पालक कॆ अनुकूल बनाता है।
4. अग्निहॊत्र करनॆ सॆ मन शांत हॊता है।
5. अग्निहॊत्र तग्य आपकॆ घर मॆ सकारात्मक वातावरण लाता है।
6. अग्निहॊत्र रॊगॊ सॆ लडनॆ मॆं आपकी मदद करता है और आप बाकी लॊगॊ की तुलना नॆ अधिक प्रमाण मॆं रॊगमुक्त रहतॆ हैं।
7.अग्निहॊत्र करनॆ सॆ आपकी दिनचर्या बदलती है आपकी नियमित दिनचर्या आपकॆ मन और आपकॆ शरीर कॆ भीतरी अंगॊ कॊ ऊर्जावान कर दॆतॆ है जिससॆ आप सुख और आनन्द का अनुभव करतॆ है।
8. अग्निहॊत्र प्रदूषण सॆ आपकॊ मुक्त रखता है चाहॆ आप घर सॆ बाहर क्यॊं न हॊं।
9. अग्निहॊत्र आपकॆ लियॆ सकारात्मक वातावरण लाता है उस वातावरण मॆं आप जॊ भी कार्य करतॆ है वह आपकॆ लियॆ अधिक फायदॆमंद और लाभ करनॆ वाला हॊता है।
10. अग्निहॊत्र करनॆ सॆ समय आनॆ वाली विपत्तियॊं जैसॆ बाढ, भूकंप, महामारियॊं आदि सॆ रक्षा करता है।

क्या अग्निहॊत्र सॆ नशा मुक्ति सम्भव है ?

अग्निहॊत्र स्मैक, चरस, गाँञा, भाँग, अफीम, तम्बाकू, सिगरॆट और अन्य सभी नशॆ की आदतॊं सॆ मुक्त करता है। यदि नशा करनॆ वाला स्वय्ं अग्निहॊत्र करता है तॊ बहुत ही अच्छा है पर नशॆ सॆ मुक्ति कॆ लियॆ रॊगी कॊ आप स्वयं अग्निहॊत्र कॆ समय बिठानॆ का प्रयत्न करॆं। कुछ महीनॆ या वर्ष मॆ वह स्वयं नशा त्याग दॆगा। यह अग्निहॊत्र मॆं ताकत है। अग्निहॊत्र सॆ निश्चित ही नशा मुक्ति सम्भव है।

मैं लगभग पिछलॆ 5 वर्षॊं सॆ भयन्कर मानसिक तनाव सॆ ग्रस्त रहती हूं तॊ यदि मै अग्निहॊत्र शुरु करुं, क्या मुझॆ लाभ हॊगा, क्या मैं तनामुक्त जीवन जी सकूंगी।

यही तॊ अग्निहॊत्र की विषॆशता है की मनुष्य कॊ अग्निहॊत्र पूर्णत: मानसिक शाँति दॆता है। नाना प्रकार कॆ मानसिक भ्रम, विकार, मानसिक अवसादॊं सॆ सदा कॆ लियॆ मुक्ति दॆता है। रॊगी का पूरी तरह सॆ ठीक हॊना इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार कॆ रॊग सॆ ग्रस्त है और वह रॊग नया है या पुराना। यानि यह निश्चित है कि समय कॆ चलतॆ आप सभी तनावॊं व रॊगॊ सॆ मुक्त‌ हॊनॆ बस, समय कम या ज्यादा लग सकता है। आप अग्निहॊत्र शुरु कीजियॆ, निश्चित रुप सॆ आप कुछ ही समय मॆं तनावॊं सॆ मुक्त हॊ जायॆँगीं।

(Source: agnihotraindia.in)

 

ए1 व ए2 दूध की कहानी

गौ की महिमा’ पुस्तिका से साभार उधृत

मूल गाय के दूध में प्रोलीन अपने स्थान 67 पर बहुत दृढ़ता से अपने पड़ोसी स्थान 66 पर स्थित अमीनोएसिड आइसोल्युसीन से जुड़ा रहता है। परन्तु जब (ए1 दूध में) प्रोलीन के स्थान पर हिस्टिडीन आ जाता है, तब इस हिस्तिडीन में अपने पड़ोसी स्थान 66 पर स्थित आइसोल्युसीन से जुड़े रहने की प्रबलता नहीं पाई जाती है।

Hestidine, मानव शरीर की पाचन क्रिया में आसानी से टूटकर बिखर जाता है और बीसीएम 7 नामक प्रोटीन बनता है। यह बीटा कैसो मार्फिन 7 अफीम परिवार का मादक पदार्थ (Narcotic) है जो बहुत प्रभावशाली आक्सीडेण्ट एजेंट के रूप में मनुष्य के स्वास्थ्य पर मादक तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव छोड़ता है। ऐसे दूध को वैज्ञानिकों ने ए1 दूध का नाम दिया है। यह दूध उन विदेशी गायों में पाया जाता जिनके डी. एन. ए. में 67वें स्थान पर प्रोलीन न होकर हिस्टिडीन होता है (दूध की एमीनो ऐसीड चेन में)।

न्युजीलैंड में जब दूध को बीसीएम 7 के कारण बड़े स्तर पर जानलेवा रोगों का कारण पाया गया तब न्यूजीलैंड के सारे डेयरी उद्योग के दूध का परीक्षण हुआ। डेयरी दूध पर किये जाने वाले प्रथम अनुसंधान में जो दूध मिला वह बीसीएम 7 से दूषित पाया गया, और वह सारा दूध ए1 कहलाया। तदुपरान्त विष रहित दूध की खोज आरम्भ हुई। बीसीएम 7 रहित दूध को ए2 नाम दिया गया। सुखद बात यह है कि देशी गाय का दूध ए2 प्रकार का पाया जाता है। देशी गाय के दूध से यह स्वास्थ्य नाशक मादक विषतत्व बीसीएम 7 नहीं बनता। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से अमेरिका में यह भी पाया गया कि ठीक से पोषित देशी गाय के दूध और दूध से बने पदार्थ मानव शरीर में कोई भी रोग उत्पन्न नहीं होने देते।

यदि भारतवर्ष का डेयरी उद्योग हमारी देशी गाय के ए2 दूध की उत्पादकता का महत्व समझ लें तो भारत तो भारत सारे विश्व डेयरी दूध व्यापार में विश्व का सबसे बड़ा पंचगव्य उत्पाद निर्यातक देश बन सकता है। यदि हमारी देशी गोपालन की नीतियों को समाज और शासन को प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित पोषाहार का निर्यात भारतवर्ष से किया जा सकता है।

आज सम्पूर्ण विश्व में यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्था में बच्चो को केवक ए2 दूध ही देना चाहिए। विश्व बाजार में न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, कोरिया, जापान और अब अमेरिका में प्रमाणित ए2 दूध के दाम साधारण ए1 डेयरी दूध के दाम से कहीं अधिक हैं। ए2 दूध देने वाली गाय विश्व में सबसे अधिक भारतवर्ष में पाई जाती है।

होल्सटीन, फ्रीजियन प्रजाति की गाय, अधिक दूध देने के कारण सारे डेयरी दूध उद्योग की पसन्दीदा है। इन्हीं के दूध के कारण लगभग सारे विश्व में डेयरी का दूध ए1 पाया गया। विश्व के सारे डेयरी उद्योग और राजनेताओं की यही समस्या है कि अपने सारे ए1 दूध को एकदम कैसे अच्छे ए2 दूध में परिवर्तित करें। अतः आज विश्व का सारा डेयरी उद्योग भविष्य में केवल ए2 दूध के उत्पादन के लिए अपनी गायों की प्रजाति में नस्ल सुधार के लिए नये कार्यक्रम चला रहा है। विश्व बाजार में भारतीय नस्ल के गीर वृषभों की इसीलिए बहुत मां ग हो गई हो। साहीवाल नस्ल के अच्छे वृषभों की भी बहुत मांग बढ़ी है।

सबसे पहले यह अनुसंधान न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने किया था। परन्तु वहां के डेयरी उद्योग और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से यह वैज्ञानिक अनुसंधान छुपाने के प्रयत्नों से उद्विग्र होने पर, 2007 में Devil in the milk illness, health and politics A1 and A2, नाम की पुस्तक कीथ वुड्फोर्ड (Keith Woodford) द्वारा न्यूजीलैंड में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में 30 वर्षों के अध्ययन के परिणाम दिए गए हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और रोगों के अनुसंधान के आंकड़ो से यह सिद्ध किया गया है कि बीसीएम 7 युक्त ए1 दूध मानव समाज के लिए विषतुल्य है, अनेक असाध्य रोगों का कारण है।

ए1 दूध का मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव

जन्म के समय बालक के शरीर में बीबीबी (ब्लड़ ब्रेन बैरियर) नहीं होता। स्तन पान कराने के बाद 3-4 वर्ष की आयु तक शरीर में यह ब्लड़ब्रेन बैरियर स्थापित हो जाता है। इसीलिए जन्मोपरान्त स्तन पान द्वारा शिशु को मिले पोषण का, बचपन में ही नहीं, बड़े हो जाने पर भी मस्तिष्क व शरीर की रोग निरोधक क्षमता, स्वास्थ्य और व्यक्तित्व के निर्माण पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

बाल्य काल के रोग

भारतवर्ष ही नहीं सारे विश्व में, जन्मोपरान्त बच्चों में जो औटिज्म़ (बोध अक्षमता) और मधमेह (Diabetes Type 1) जैसे रोग बढ़ रहे हैं, उनका स्पष्ट कारण बीसीएम 7 वाला ए1 दूध है।

व्यस्क समाज के रोग

मानव शरीर के सभी सुरक्षा तंत्र विघटन से उत्पन्न (Metabolic Degenerative) रोग जैसे उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा मधुमेह का प्रत्यक्ष सम्बन्ध बीसीएम 7 वाले ए1 दूध से स्थापित हो चुका है। यही नहीं बुढ़ापे के मानसिक रोग भी बचपन में ग्रहण ए1 दूध के प्रभाव के रूप में भी देखे जा रहे हैं। दुनिया भर में डेयरी उद्योग आज चुपचाप अपने पशुओं की प्रजनन नीतियों में अच्छा दूध अर्थात् बीसीएम 7 मुक्त ए2 दूध के उत्पादन के आधार पर बदलाव ला रहा है।

अमेरिकी कुनिति, हमारी भूल

अमेरीकी तथा यूरोपीय देश अपने विषाक्त गौवंश से छुटकारा पाने के लिए उन्हें मंहगे मूल्यों पर भारत में भेज रहे हैं। ये हाल्स्टीन, जर्सी, एच एफ उन्हीं की देन है।

देश में दूध की जरूरत पूरी करने के नाम पर, दूध बढ़ाने के लिए अपनी सन्तानों और देशवासियों को विषैला, रोगकारक दूध पिलाना उचित कैसे हो सकता है? आखिरकार इन नीति निर्धारक नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के परिवार, बच्चे और वे स्वयं भी तो इन रोगों का शिकार बन रहे होंगे। सच तो यह है कि वे सब इन खतरों से अनजान है। जो चन्द वैज्ञानिक व नागरिक इसके बारे में जानते हैं, उनकी आवाज़ इतनी ऊँची नहीं कि सच सब तक पहुंचे। विदेशी व्यापारी ताकतें और बिका मीडिया इन तथ्यों को दबाने, छुपाने के सब सम्भव व उपाय व्यापारी ताकतों के हित में करता रहता है।

हमारा कर्तव्य, एक आह्वान

ज़रा विहंगम दृष्टि से देश व विश्व के परिदृश्य को निहारें। तेजी से सब कुछ बदल रहा है, सात्विक  शक्तियां बलवान होती जा रही हैं। हम सब भी सामथ्यानुसार, सम्भव सहयोग करना शुरू करें, सफलता मिलती नजर आएगी। कम से कम अपने आसपास के लोगों को उपरोक्त तथ्यों की जानकारी देना शुरू करें, या इससे अधिक जो भी उचित लगे करें। सकारात्मक सोच, साधना, उत्साह बना रहे, देखें फिर क्या नहीं होता।

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विदेशी गौवंश से जैविक खेती असंभव

विदेशी गोवंश अथार्थ वह गाय की प्रजाति जो भारत से बाहर की हो उस गोवंश का दूध-घी अनेक असाध्य रोग पैदा करता हैं, उसका गोबर व गौमूत्र विषमुक्त कैसे हो सकता हैं? हमारी जानकारी के अनुसार जिन खेतों में इनकी गोबर खाद डलेगी, उनमे खेती होने के उपरांत उपज बहुत घट जायेगी, उन खेतों में उपज उससे अधिक होगी जिनमे इनके गोबर की खाद नहीं पड़ी। इस प्रकार की जैविक खेती का वर्णन अधोलिखित है |

कुछ अनुभव, कुछ सरल प्रयोग

  • गाय का गोबर हाथों पर साबुन की तरह लगाकर हाथ धोंये। यदि हाथ चिकने, मुलायम हो जाए तो उस गाय-बैल में ‘ए१’ विष नहीं हैं या कम हैं। पर यदि हाथ खुश्क हो जाए (चिकने न हो) तो वह पूरी तरह विषाक्त हैं। गजरौला के निकट एक गाँव के किसानो ने इस गाय को ‘पूतना’ नाम दिया हैं। वहीं जो श्री कृष्ण को जहरीला स्तनपान करवाने गई थी।
  • जिस खेत में विदेशी गोवंश को घुमा देंगे उसकी फसल मर जायेगी या बहुत ही कम होगी। ‘एचऍफ़’ और ‘होलिस्टिन’ में यह विष अधिक हैं। बुवाई से पहले घुमाने पर भी यही दुष्प्रभाव होगा। जिस खेत में स्वदेशी गाय-बैल को घुमा देंगे, उसकी फसल १०-२० प्रतिशत बढ़ जाएगी।
  • अनेक किसानों का अनुभव हैं कि हमारा स्वदेशी केंचुआ विदेशी गायों के गोबर में नहीं टिकता, भाग जाता हैं। वह स्वदेशी गायों के गोबर में बड़े आराम से पलता, बढ़ता रहता हैं। यानी केंचुआ भी विदेशी गोवंश के गोबर की विषाक्तता को पहचानता हैं। पर हमारे वैज्ञानिक?

कुलपति पर प्रभाव

‘गवाक्ष भारती’ में एक लेख इसी विषय पर छपा था जिसका शीर्षक था ‘समझदार केंचुए – न समझे वैज्ञानिक’। औद्यानिकी विश्विद्यालय – नौणी (सोलन) के कुलपति उस लेख को पढ़कर बड़े प्रसन्न व प्रभावित हुए कि उन्होंने गवाक्ष भारती का सदस्य बनाने की इच्छा प्रकट की। तभी से वे इस पत्रिका के संरक्षक हैं।

विदेशी केंचुआ विषाक्त?

स्मरणीय हैं कि विदेशी केंचुआ ‘एसीना फोएटीडा’ विदेशी गोवंश के विषैले गोबर में बड़े आराम से रहता हैं। इससे संदेह होता हैं कि उस केंचुए द्वारा बनी गोबर खाद और भी हानिकारक हो सकती हैं। विदेशी केचुए और उससे बनी खाद को सरकार व विदेशी एजेंसियों द्वारा बढ़ावा देने से संदेह को और अधिक बल मिलता हैं।

अपनी खाद, अपना केंचुआ

अतः सुझाव हैं कि खाद के लिए स्वदेशी गोवंश के गोबर पर थोडा गौमूत्र व देसी गुड़ घोलकर छिड़काव करें, भरपूर स्वदेशी केंचुए पैदा होंगे। खाद बनने पर इसे छानना जरुरी नहीं हैं। इसी गोबर खाद की एक दो टोकरी नई खाद बनाते समय डालें, गुड़ का घोल अल्प मात्रा में डालें, केंचुए पैदा हो जाते हैं। इस प्रकार की जैविक खेती ही सर्वश्रेष्ठ उपज प्रदान करती है | इसीलिए कहा जाता है अपनी खाद, अपना केंचुआ |

अनुपम हैं अपने गौ पंचगव्य उत्पाद

इसके अलावा गोवंश के घी, दूध, गोबर, गौमूत्र से अधरंग, उच्च रक्तचाप, माईग्रेन, स्त्रियों का प्रदर रोग, लीवर व किडनी फेलियर, हृदय रोग सरलता से ठीक होते हैं। इन पर विवरण अगले अंकों में देने का प्रयास रहेगा। पर इतना सुनिश्चित हैं कि विदेशी गोवंश और हाईब्रिड व जी.एम. बीजों के रहते जैविक खेती असंभव हैं। इतना ही नहीं, किसान की समृद्धी व सुख भी स्थाई नहीं हो सकते।

विदेशी गोवंश का समाधान

समाधान सरल हैं। जिस प्रकार विदेशी सांडों के वीर्य से कृत्रिम गर्भधारण करके हमने अपने गोवंश को बिगाड़ा हैं। उसी प्रकार अब अपनी इन गऊओं को स्वदेशी नस्ल से गर्भाधान करवाएं। यदि स्वदेशी बैल न मिलें तो पाशुपालन विभाग के सहयोग से साहिवाल, रेड सिन्धी के वीर्य का टिका लगवाए।

इस प्रक्रिया से केवल एक पीढ़ी में काफी हद तक वंश सुधार हो जायेगा। तीसरी पीढ़ी में तो लगभग पूरी तरह गोवंश स्वदेशी बनाना संभव हैं। अतः समस्या बड़ी तो हैं पर समाधान भी सरल हैं।

पंचायत प्रधान व प्रभावी लोगों के सहयोग से सरकार को प्रेरित किया जा सकता हैं कि वह स्वदेशी साड़ों या उनके वीर्य की (या दोनों की) व्यवस्था करें। कठिनाई होने पर गवाक्ष भारती कार्यालय से संपर्क करे, आशा हैं समाधान मिलेगा।

सोने से भरपूर पंचगव्य

अनेक मूल्य तत्वों के आलावा गाय के दूध, घी व मूत्र में स्वर्ण अंश भी पाए जाते हैं। आयुर्वेद के इलावा अब तो आधुनिक विज्ञान भी मनाता है कि स्वर्ण से हमारी जीवनी शक्ति, बल ओज बहुत बढ़ जाते हैं।

विदेशी/ स्वदेशीनैनो गोल्ड एच डी एल

‘जनरल ऑफ़ अमेरिकन क्रैमिकल्ज’ में छपी एक खर के अनुसार उन्होंने स्वर्ण के नैनो कणों से ‘एच. डी. एल.’ बनाया है। नार्थ वैस्ट विश्वविद्यालय द्वारा बनाये इस ‘एच. डी. एल.’ के बारे मे दावा किया गया हैं कि इसके प्रयोग से हानिकारक ‘एल. डी. एल.’ का स्तर कम होगा और तले, भुने पदार्थ रोगी खूब खा सकेंगे।

पर हम भारतीयों को अमेरिकियों के बनाये ‘एच. डी. एल.’ की क्या जरूरत हैं, हमारे पास स्वर्ण युक्त पंचगव्य वाली स्वदेशी गाय जो है। है न? नहीं है तो व्यवस्था करनी होगी, अपने घर पर संभव नहीं तो किसी किसान के पास, ताकि उसके उत्पाद हमें मिल सके। याद रहे के इसके घी से कभी कोलेस्ट्रोल नहीं बढ़ता अर्थात यह हृदय के लिए लाभदायक है। जितना हो सके लोगो को स्वदेशी गाय के गोभर, गोमूत्र से ही जैविक खेती करने को प्रेरित करे |

हमारे शास्त्रों के अनुसार हमारी गाय की पीठ में ‘सूर्य केतु’ नाम की नाडी है जो सूर्य के प्रकाश में स्वर्ण का निर्माण करती है, जिससे इसका दूध, घी अमूल्य गुणों से भरपूर हो जाता हैं।

स्वदेशीविदेशी गोवंश की पहचान

न्यूज़ीलैंड में विषयुक्त और विषरहित (ए१ और ए२) गाय की पहचान उसकी पूंछ के बाल की डी.न.ए. जाँच से हो जाती है। इसके लिए एक २२ डॉलर की किट बनाई गई थी। भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हैं। केंद्र सरकार के शोध संस्थानों में यह जांच होती हैं पर किसानो को तो यह सेवा उपलब्द ही नहीं है। वास्तव में हमें इस जांच की जरुरत भी नहीं है। हम अपने देसी तरीकों से यह जांच सरलता से कर सकते हैं।

ऐसी हैं अपनी गौ

हमारी गाय की,

  • पीठ गोलाकार-ढलानदार (पूँछ की और)
  • झालरदार गलकंबल
  • थूथ
  • बड़े कान
  • सुन्दर आँखे
  • बाल छोटे-मोटे
  • खाल चमकीली
  • मख्खी-मच्छर उड़ने के लिए वह अपनी खाल को सरलता से प्रकम्पित कर लेती हैं
  • गोबर बन्धा
  • धारीदार
  • उसके आसपास दुर्गन्ध नहीं होती
  • मख्खियां अपेक्षाकृत काफी कम होती है।

सुक्ष्म दर्शी से देखने पर प्रति वर्ग से.मी. १५०० से १६०० छिद्र पाए जाते हैं जिससे शारीर में वाष्पिकरण सहज होता है। यह काफी अधिक गर्मी-सर्दी सह सकती है। रोग निरोधक शक्ति प्रबल है। अतः रोग तथा मृत्युदर कम है।

विदेशी गोवंश ऐसा हैं

इसके विपरीत विदेशी गोवंश के,

  • गलकंबल व थूथ (चुहड़) नहीं होती। (कुछ स्वदेशी गोवंश भी बिना थूथ या बहुत छोटी थूथ वाला है।)
  • बाल लम्बे व बारीक
  • खल चमक रहित व दुर्गान्धित
  • खाल प्रकम्पन नहीं कर सकती
  • गोबर भैंस जैसा ढीला व रेखा रहित
  • आसपास दुर्गन्ध व बहुत मख्खियां होती हैं
  • आंखें भी सुन्दर नहीं
  • अधिकांश के माथे के मध्य में सींग जैसी हड्डी भी उभरी रहती है, मानो राक्षस हो। कथा-कहानियों में राक्षसों के माथे पर सींग दिखाया जाता है।
  • पीठ सीधी व पूंछ की तरफ नोकदार हड्डियां पीछे की और निकली रहती हैं। पीठ जीतनी सीधी और पूंछ की ओर नोकदार भाग जितना अधिक उभरा हो, वह गौ उतनी विषाक्त होगी। अधिक विषयुक्त गाय की आंखें भी बहार को उभरी व डरावनी होंगी।

भारत में मिलीजुली नस्ले बढ़ती जा रही हैं। अतः कई गऊए मिलेजुले लक्षणों की होंगी। जिसमें जैसे लक्षण जितने अधिक होंगे, वह इतनी लाभदायक या हानिकारक होंगी।

डरावनी आंखें, माथे पर उभरी हुई हड्डी, बाल लम्बे पीठ सीधी नोकीले पिछाडे़ वाले लक्षणों की गाय बहुत हानिकारण मानी जानी चाहिए। इनके संपर्क, इसकी आवाज (रम्भा ने) मात्र से अनेक शारीरिक मानसिक रोग संभव हैं।

इस प्रकार हम सरलता से देशी-विदेशी, अच्छी-बुरी गोवंश की पहचान कर सकते हैं और उनके वंश सुधर के प्रयास कर सकते हैं। विशेष ध्यान रहे कि अपनी गऊओं के सिंग कभी काटने की भूल न करें। ये एक एण्टीना की तरह काम करते हैं और चन्द्रमा तथा दिव्य अन्तरिक्षीय उर्जा को ग्रहण करने में सहायता करते हैं।

-राज विशारद

 

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विषाक्त है विदेशी गऊओं का दूध

मथुरा के ‘पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय एवं गौ अनुसंधन संस्थान’ में नेशनल ब्यूरो आफ जैनेटिक रिसोर्सिज़, करनाल (नेशनल क्रांऊसिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च-भारत सरकार) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. देवेन्द्र सदाना द्वारा एक प्रस्तुति 4 सितम्बर को दी गई।

मथुरा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सामने दी गई प्रस्तुति में डा. सदाना ने जानकारी दी किः

अधिकांश विदेशी गोवंश (हॅालस्टीन, जर्सी, एच एफ आदि) के दूध में ‘बीटा कैसीन ए1’ नामक प्रोटीन पाया जाता है जिससे अनेक असाध्य रोग पैदा होते हैं। पांच रोग होने के स्पष्ट प्रमाण वैज्ञानिकों को मिल चुके हैं –

  1. इस्चीमिया हार्ट ड़िजीज (रक्तवाहिका नाड़ियों का अवरुद्ध होना)।
  2. मधुमेह-मिलाईटिस या डायबिट़िज टाईप-1 (पैंक्रिया का खराब होना जिसमें इन्सूलीन बनना बन्द हो जाता है।)
  3. आटिज़्म (मानसिक रूप से विकलांग बच्चों का जन्म होना)।
  4. शिजोफ्रेनिया (स्नायु कोषों का नष्ट होना तथा अन्य मानसिक रोग)।
  5. सडन इनफैण्ट डैथ सिंड्रोम (बच्चे किसी ज्ञात कारण के बिना अचानक मरने लगते हैं)।

टिप्पणीः विचारणीय यह है कि हानिकारक ए1 प्रोटीन के कारण यदि उपरोक्त पांच असाध्य रोग होते हैं तो और उनेक रोग भी तो होते होंगे। यदि इस दूध के कारण मनुष्य का सुरक्षा तंत्र नष्ट हो जाता है तो फिर न जाने कितने ही और रोग भी हो रहे होंगे, जिन पर अभी खोज नहीं हुई।

दूध की संरचना

आमतौर पर दूघ में,
83 से 87 प्रतिशत तक पानी
3.5 से 6 प्रतिशत तक वसा (फैट)
4.8 से 5.2 प्रतिशत तक कार्बोहाइड्रेड

3.1 से 3.9 प्रतिशत तक प्रोटीन होती है। इस प्रकार कुल ठोस पदार्थ 12 से 15 प्रतिशत तक होता है। लैक्टोज़ 4.7 से 5.1 प्रतिशत तक है। शेष तत्व अम्ल, एन्जाईम विटामिन आदि 0.6 से 0.7 प्रतिशत तक होते है।

गाय के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन 2 प्रकार के हैं। एक ‘केसीन’ और दूसरा है ‘व्हे’ प्रोटीन। दूध में केसीन प्रोटीन 4 प्रकार का मिला हैः

अल्फा एस1 (39 से 46 प्रतिशत)
एल्फा एस2 (8 से 11 प्रतिशत)
बीटा कैसीन (25 से 35 प्रतिशत)
कापा केसीन (8 से 15 प्रतिशत)

गाय के दूध में पाए गए प्रोटीन में लगभग एक तिहाई ‘बीटा कैसीन’ नामक प्रोटीन है। अलग-अलग प्रकार की गऊओं में अनुवांशिकता (जैनेटिक कोड) के आधार पर ‘केसीन प्रोटीन’ अलग-अलग प्रकार का होता है जो दूध की संरचना को प्रभावित करता है, या यूं कहे कि उसमें गुणात्मक परिवर्तन करता है। उपभोक्ता पर उसके अलग-अलग प्रभाव हो सकते हैं।

बीटा कैसीन ए1, ए2 में अन्तर क्या है?

बीटा कैसीन के 12 प्रकार ज्ञात हैं जिनमें ए1 और ए2 प्रमुख हैं। ए2 की एमिनो एसिड़ श्रृंखला (कड़ी) में 67 वें स्थान पर ‘प्रोलीन’ होता है। जबकि ए1 प्रकार में यह ‘प्रोलीन’ के स्थान पर विषाक्त ‘हिस्टिडीन’ है। ए1 में यह कड़ी कमजोर होती है तथा पाचन के समय टूट जाती है और विषाक्त प्रोटीन ‘बीटा कैसोमार्फीन 7’ बनाती है।

विदेशी गोवंस विषाक्त क्यों है?

जैसा कि शुरू में बतलाया गया है कि विदेशी गोवंश में अधिकांश गऊओं के दूध में ‘बीटा कैसीन ए1’ नामक प्रोटीन पाया गया है। हम जब इस दूध को पीते हैं और इसमें शरीर के पाचक रस मिलते हैं व इसका पाचन शुरू होता है, तब इस दूध के ए1 नामक प्रोटीन की 67वीं कमजोर कड़ी टूटकर अलग हो जाती है और इसके ‘हिस्टिाडीन’ से ‘बी.सी.एम. 7’ (बीटा कैसो माफिन 7) का निर्माण होता है। सात सड़ियों वाला यह विषाक्त प्रोटीन ‘बी.सी.एम 7’ पूर्वोक्त सारे रोगों को पैदा करता है। शरीर के सुरक्षा तंत्र को नष्ट करके अनेक असाध्य रोगों का कारण बनता है।

भारतीय गोवंस विशेष क्यों

करनाल स्थित भारत सरकार के करनाल स्थित ब्यूरो के द्वारा किए गए शोध के अनुसार भारत की 98 प्रतिशत नस्लें ए2 प्रकार के प्रोटीन वाली अर्थात् विष रहित हैं। इसके दूध की प्रोटीन की एमीनो एसिड़ चेन (बीटा कैसीन ए2) में 67वें स्थान पर ‘प्रोलीन’ है और यह अपने साथ की 66वीं कड़ी के साथ मजबूती के साथ जुड़ी रहती है तथा पाचन के समय टूटती नहीं। 66वीं कड़ी में ऐमीनो ऐसिड ‘आइसोल्यूसीन’ होता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भारत की 2 प्रतिशत नस्लों में ए1 नामक एलिल (विषैला प्रोटीन) विदेशी गोवंश के साथ हुए ‘म्यूटेशन के कारण’ आया हो सकता है।

एन.बी.ए.जी.आर. – करनाल द्वारा भारत की 25 नस्लों की गऊओं के 900 सैंम्पल लिए गए थे। उनमें से 97-98 प्रतिशत ए2ए2 पाए गए गथा एक भी ए1ए1 नहीं निकला। कुछ सैंम्पल ए1ए2 थे जिसका कारण विदेशी गोवंस का सम्पर्क होने की सम्भावना प्रकट की जा रही है।

गुण सूत्र

गुण सूत्र जोड़ों में होते हैं, अतः स्वदेशी-विदेशी गोवंश की डी.एन.ए. जांच करने पर

‘ए1, ए2’

‘ए1, ए2’

‘ए2, ए2’

के रूप में गुण सूत्रों की पहचान होती है। स्पष्ट है कि विदेशी गोवंश ‘ए1ए1’ गुणसूत्र वाला तथा भारतीय ‘ए2, ए2’ है।

केवल दूध के प्रोटीन के आधार पर ही भारतीय गोवंश की श्रेष्ठता बतलाना अपर्याप्त होगा। क्योंकि बकरी, भैंस, ऊँटनी आदि सभी प्राणियों का दूध विष रहित ए2 प्रकार का है। भारतीय गोवंश में इसके अतिरिक्त भी अनेक गुण पाए गए हैं। भैंस के दूध के ग्लोब्यूल अपेक्षाकृत अधिक बड़े होते हैं तथा मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव करने वाले हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों के अनुसार भी भैंस का दूध मस्तिष्क के लिए अच्छा नहीं, वातकारक (गठिाया जैसे रोग पैदा करने वाला), गरिष्ठ व कब्जकारक है। जबकि गो दूग्ध बुद्धि, आयु व स्वास्थ्य, सौंदर्य वर्धक बतलाया गया है।

भारतीय गोवंस अनेक गुणों वाला है

1. बुद्धिवर्धकः खोजों के अनुसार भारतीय गऊओं के दूध में ‘सैरिब्रोसाईट’ नामक तत्व पाया गया है जो मस्तिष्क के ‘सैरिब्रम को स्वस्थ-सबल बनाता है। यह स्नायु कोषों को बल देने वाला, बुद्धि वर्धक है।

2. गाय के दूध से फुर्तीः जन्म लेने पर गाय का पछड़ा जल्दी ही चलने लगता है जबकि भैंस का पाडा रेंगता है। स्पष्ट है कि गाय एवं उसके दूध में भैंस की अपेक्षा अधिक फुर्ती होती है।

3. आँखों की ज्योति, कद और बल को बढ़ाने वालाः भारतीय गौ की आँत 180 फुट लम्बी होती है। गाय के दूध में केरोटीन नामक एक ऐसा उपयोगी एवं बलशाली पदार्थ मिलता है जो भैंस के दूस से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। बच्चों की लम्बाई और सभी के बल को बढ़ाने के लिए यह अत्यन्त उपयोगी होता है। आँखों की ज्योति को बढ़ाने के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। यह कैंसर रोधक भी है।

4. असाध्य बिमारीयों की समाप्तिः गाय के दूध में स्टोनटियन नामक ऐसा पदार्थ भी होता है जो विकिर्ण (रेडियेशन) प्रतिरोधक होता है। यह असाध्य बिमारियों को शरीर पर आक्रमण करने से रोकने का कार्य भी करता है। रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है जिससे रोग का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

5. रामबाण है गाय का दूध – ओमेगा 3 से भरपूरः वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद यह सिद्ध हो चुका है कि फैटी एसिड ओमेगा 3 (यह एक ऐसा पौष्टिकतावर्धक तत्व है, जो सभी रोगों की समाप्ति के लिए रामबाण है) केवल गो माता के दूध में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है। आहार में ओमेगा 3 से डी. एच. तत्व बढ़ता है। इसी तत्व से मानव-मस्तिष्क और आँखों की ज्योति बढ़ती है। डी. एच. में दो तत्व ओमेगा 3 और ओमेगा 6 बताये जाते हैं। मस्तिष्क का संतुलन इसी तत्व से बनता है। आज विदेशी वैज्ञानिक इसके कैप्सूल बनाकर दवा के रूप में इसे बेचकर अरबो-खरबो रुपये का व्यापार कर रहे हैं।

6. विटामिन से भरपूर-माँ के दूध के समकक्षः प्रो. एन. एन. गोडकेले के अनुसार गाय के दूध में अल्बुमिनाइड, वसा, क्षार, लवण तथा कार्बोहाइड्रेड तो हैं ही साथ ही समस्त विटामिन भी उपलब्ध हैं। यह भी पाया गया कि देशी गाय के दूध में 8 प्रतिशत प्रोटीन, 0.7 प्रतिशत खनिज व विटामिन ए, बी, सी, डी व ई प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं, जो गर्भवती महिलाओं व बच्चों के लिए अत्यन्त उपयोगी होते हैं।

7. कॅालेस्ट्राल से मुक्तिः वैज्ञानिकों के अनुसार कि गाय के दूध से कोलेस्ट्रोल नहीं बढ़ता। हृदय रोगियों के लिए यह बहुत उपयोगी माना गया है। फलस्वरूप मोटापा भी नहीं बढ़ता है। गाय का दूध व्यक्ति को छरहरा (स्लिम) एवं चुस्त भी रखता है।

8. टी.बी. और कैंसर की समाप्तिः क्षय (टी.बी) रोगी को यदि गाय के दूध में शतावरी मिलाकर दी जाये तो टी.बी. रोग समाप्त हो जाता है। एसमें एच.डी.जी.आई. प्रोटीन होने से रक्त की शिराओं में कैंसर प्रवेश नहीं कर सकता। पंचगव्य आधारित 80 बिस्तर वाला कैंसर हॅास्पिटल गिरी विहार, संकुल नेशनल हाईवे नं. 8, नवसारी रोड़, वागलधारा, जि. बलसाड़, गुजरात में है। यहा तीसरी स्टेज के कैंसर के रोगियों का इलाज हो ता पर अब उनकी सफलता किन्ही कारणों से पहले जैसी नहीं रही है।

9. इन्टरनेशनल कार्डियोलॅाजी के अध्यक्ष डा. शान्तिलाल शाह ने कहा है कि भैंस के दूध में लाँगचेन फेट होता है जो नसों में जम जाता है। फलस्वरूप हार्टअटैक की सम्भावना अधिक हो जाती ही। इसलिए हृदय रोगियों के लिए गाय का दूध ही सर्वोत्तम है। भैंस के दूध के ग्लोब्यूल्ज़ भी आकार में अधिक बड़े होते हैं तथा स्नायु कोषों के लिए हानिकारक हैं।

10. बी-12 विटामिनः बी-12 भारतीय गाय की बड़ी आंतों में अत्यधिक पाया जाता है, जो व्यक्ति को निरोगी एवं दीर्घायु बनाता है। इससे बच्चों एवं बड़ों को शारीरिक विकास में बढ़ोतरी तो होती ही है साथ ही खून की कमी जैसी बिमारियां (एनीमिया) भी ठीक हो जाती है।

11. गाय के दूध में दस गुणः
चरक संहिता (सूत्र 27/217) में गाय के दूध में दस गुणों का वर्णन है-

स्वादु, शीत, मृदु, स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्।
गुरु मंदं प्रसन्नं च गल्यं दशगुणं पय॥

अर्थात्- गाय का दूध स्वादिष्ट, शीतल, कोमल, चिकना, गाढ़ा, श्लक्ष्ण, लसदार, भारी और बाहरी प्रभाव को विलम्ब से ग्रहरण करने वाला तथा मन को प्रसन्न करने वाला होता है।

12. केवल भारतीय देसी नस्ल की गाय का दूध ही पौष्टिकः करनाल के नेशनल ब्यूरो आफ एनिमल जैनिटिक रिसोर्सेज (एन.बी.ए.जी.आर.) संस्था ने अध्ययन कर पाया कि भारतीय गायों में प्रचुर मात्रा में ए2 एलील जीन पाया जाता हैं, जो उन्हें स्वास्थ्यवर्धक दूध उप्तन्न करने में मदद करता है। भारतीय नस्लों में इस जीन की फ्रिक्वेंसी 100 प्रतिशत तक पाई जाती है।

13. कोलेस्ट्रम (खीस) में है जीवनी शक्तिः प्रसव के बाद गाय के दूध में ऐसे तत्व होते हैं जो अत्यन्त मूल्यवान, स्वास्थ्यवर्धक हैं। इसलिए इसे सूखाकर व इसके कैप्सूल बनाकर, असाध्य रोगों की चिकित्सा के लिए इसे बेचा जा रहा है। यही कारण है कि जन्म के बाद बछड़े, बछिया को यह दूध अवश्य पिलाना चाहिए। इससे उसकी जीवनी शक्ति आजीवन बनी रहती है। इसके अलावा गौ उत्पादों में कैंसर रोधी तत्व एनडीजीआई भी पाया गया है जिस पर यूएस पेटेन्ट प्राप्त है।

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विषैले दूध की कहानी से पर्दा हटा

अनेक लोगों के समान हम लोग भ स्वदेशी गोवंश को उपयोगी समझकर उसके पक्ष में प्रचार, प्रयास कर ह रहे थे। लगभग 5 वर्ष पूर्व ‘नैट’ से वास्ता पड़ा। संयोग की बात कहें या उस परम सत्ता का खेल, एक ऐसी साईट मिली जिससे पता चला कि अधिकांश विदेशी गऊएं ‘ए1’ नामक बीटाकैसीन प्रोटीन वाली है जो विषाक्त प्रभाव वाला और अनेक असाध्य रोग पैदा करता है। यूरोप की कुछ गऊएं ‘ए2’ नामक हानि रहित बीटा कैसीन प्रोटीन वाली बतलाई जाती हैं।

किन्तु किसी भी ‘सर्च इंजन’ ने यह नहीं बतलाया कि भारतीय गैवंश सर्वोत्तम है तथा ‘ए2’ प्रोटीन वाला है। जब हमें पता चला कि ब्राजील ने 40 लाख से अधिक भारतीय गैवंश (गीर, सहिवाल, रैड सिंधी) तैयार किया है तो विश्वास हो गया कि भारतीय गैवंश ‘ए2’ है। बाद में ‘यूट्यूब‘ में देखा कि अमेरीका व अनेक यूरोपीय देश ‘ब्रह्मामिन काऊ‘ के नाम पर शुद्ध भारतीय गोवंश (एच एफ, हॅाल्स्टीन, जर्सी आदि) हमें मंहगे दामों पर दे रहे है।

तभी से विषाक्त ‘ए1‘ के बारे में प्रदेशभर की गौशालाओ व वैज्ञानिको को बतलाने लगे। सरकार पर हमारे प्रयासों का कोई प्रभाव न पड़ना था, न पड़ा।

पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में गौ विज्ञान पर संगोष्ठी

अन्त में प्रभु प्रेरणा से सूझा कि शोध पत्र पठन और सेमिनार इसका समाधान हो सकता है। एक साथी बलदेव राज सूद के प्रयासों से सरकार से 2 लाख रुपये सेमिनार हेतु स्वीकृत हुआ। उन्ही के प्रयास से पालमपुर कृषि वि.वि. के कुलपति डॉ. एस के शर्मा का पूर्ण सहयोग मिला। गोरक्षण-संवर्धन परिषद के रामऋषि भारद्वाज व उनके साथी ललित जी ने आयोजन व्यवस्था सम्भाली, नीतिगत निर्णयों व जटिल समस्याओं को सुलझाने में रोहिताश कुठियाला का बड़ा सहयोग मिला। शिमला विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य अरुण दिवाकर नाथ बाजपेई ने खूब उत्साह बढ़ाया व लम्बी यात्रा करके मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। ‘सेमिनार आयोजन समिति‘ मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य के रूप में औद्यानिकी वि.वि. नौणी, सोलन के कुलपति डॉ. के. आर. धीमान का सहयोग मिला। आयोजन समिति के अध्यक्ष बने शूलिनी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पी. के. खोसला। पी. सी. कपूर (तत्कालीन सचिव पशुपालन विभाग) ने स्वीकृत राशि बढ़ाकर एक से दो लाख करना मान लिया।

एन. बी. ए. जी आर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेन्द्र कुमार सदाना ने तकनीकी परामर्श की जिम्मेवारी सम्भाली। स्मारिका प्रकाशन का जटिल-कठिन कार्य उन्होंने कुशलता से निभाया।

पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति व वैटनरी विभाग की पूरी टीम का अनापेक्षित सहयोग मिला। डॉ. ए. सी. वार्षणेय (अब मथुरा के कुलपति) डॉ. सी वार्षणेय (अब डीन है) आदि सबने सहयोग में कसर नहीं रखी। पंजीकरण का कार्य ‘आर्टआफ लीविंग’ के पुनीत कपूर व उनके साथियों ने सम्भाला। एक साथी देवानन्द गौतम अपनी गाड़ी लेकर निरन्तर साथ बने रहे व सम्भव सहयोग करते रहे। पालमपुर प्रैस से शारदान्द गौतम, प्रैस के प्रधान व अन्य सबका खूब सहयोग मिला।

नागपुर के गोविज्ञान केन्द्र-देवला पार के श्री सुनील मानसिंहका अनुभव पूर्ण सहयोग व मार्गदर्शन इस आयोजन की सफलता का एक स्तम्भ रहा।

पशुपालन विभाग के निर्देशक डॉ. डी. पी. मल्होत्रा संयुक्त निर्देशक डॉ. अश्विनी गुप्ता तथा डॉ. अशोक की टीम का भी भरपूर सहयोग मिला।

अन्ततोगत्व 25-26 मई 2012 को दो दिवसीय ‘गोविज्ञान’ पर राष्ट्रीय संगोष्टी सम्पन्न हुई। संगोष्टी में प्रस्तुत शोध पत्रों से स्पष्ट हो गया कि विदेशी गोवंश विषाक्त हे और स्वदेशी विषमुक्त, लाभदायक प्रोटीन वाला है। निर्देशक डॉ. मल्होत्रा मंच से बोले कि हम नीतियां बनाने वाले हैं, लगता है कि हमसे गलती हो गई है।

तब से लेकर आज तक चार निर्देशक सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पर यह सूचना (ए1, ए2) हिमाचल पशुपालन विभाग के निर्देशालय से निकलकर विभाग के शेष चिकित्सकों तक नहीं पहुंची है। सरकारी नीतियाँ भी जैसी की तैसी हैं। सारे देश व पहाड़ की श्रेष्ठ गऊओं को विषाक्त विदेशी सांडों के वीर्य के टीके लगाकर पीढ़ी दर पीढ़ी अधिकाधिक विषाक्त बनाया जाना निरन्तर जारी है।

हम सब साथियों को लगता है कि पशुपालन विभाग के वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, तकनीकी कर्मचारियों के इलावा यह जानकारी (ए1 तथा ए2 प्रोटीन के बारे में) आयुर्वेदिक व एलोपैथिक चिकित्सकों, कृषि व औद्यानिकी वैज्ञानिकों सहित जागरूक नागरिकों, प्रंशासकों, नेताओं समाजसेवियों तक पहुंचनी चाहिए।

हम सबका विश्वास है कि परिवर्तन का समय बहुत पास है। हमारे प्रयास व्यर्थ जाने का कोई कारण नहीं, सफलता सुनिश्चित है। इस अभियान में आप सबका विश्वास, शुभकामनाएं व सहयोग हमारे साथ रहेगा, इसमें हमें सन्देह नहीं।

आपका,
वैद्य राजेश कपूर
Email: [email protected]